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रविवार, 28 नवंबर 2010

सौवां धमाल: लाल और बवाल

एक अंतराल के बाद जबलपुर पहुँच फिर जमी महफ़िल लाल और बवाल की और यह दौर यूँ ही चलता रहेगा रुबरु जब तक जबलपुर प्रवास जारी है.



कल कुछ मजेदार एवं यादगार समय बीता लाल और बवाल का गिरीश बिल्लोरे जी और सलिल समाधिया जी के साथ, जिसे रिकार्ड कर एक नये प्रयोग की शुरुवात हुई. यह मिलन ऑन लाईन लाईव ब्रॉडकास्ट किया गया भाई बिल्लोरे जी द्वारा:




फिर बैठे लाल और बवाल अपने पुराने चिरपरिचित डेरे पर. कुछ जुगल बंदियों का दौर चला, कुछ बीती बातें..जाने कितनी रात तक महफिल चलती रही. बवाल गाता रहा, लाल सुनाता रहा. बवाल ने गाया एक मुखड़ा लाल के लिखे गीत का. गाया तो और भी बहुत कुछ, मगर अभी रिकार्डिंग सिर्फ मुखड़े की उपलब्ध है, बाकी तो रोज होती ही रहेगी.

गीत पढ़िये और फिर बवाल से मुखड़ा सुनिये:

बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो !!


टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया !
कोई बहर-वहर की बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया !!
------परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया !!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !


ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं !
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं !!
------धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं !!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !


आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है !
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है !!
------हृदयों को जिसने जीत लिया,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !

-समीर लाल ’समीर’




और इस तरह इस पोस्ट के साथ आज पूरा हुआ १००वीं पोस्ट का सिलसिला जो अनवरत जारी रहेगा.

आप सबके स्नेह का लाल और बवाल की तरफ से बहुत बहुत आभार.

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

अलसेट में हो गया लेट : नतीजा बवाल की रीमिक्स पहेली २००९ का

आदरणीय एवं प्रिय आत्मीयजनों,
साल २००९ की और बवाल की अब तक की इकलौती “रीमिक्स" पहेली के नतीजे की घोषणा करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। हालाँकि यह अपने निर्धारित समय से कई दिन बाद हो पा रही है क्योंकि इसके आयोजक पिछले दिनों ज़रा अलसेट में पड़े हुए थे, और इसीलिए देर के लिए हम आप सब के क्षमाप्रार्थी हैं। अलसेट का तो ऐसा है कि जब जब वो हमें होती है तो अपने साथ साथ हम अपने कुछ प्रियजनों की भी अलसेट करवा देते हैं ताकि उनका हमारा साथ बना रहे। हा हा। देखिए ना पिछले दस-पाँच दिनों में हमारे कितने ही प्रियजनों की अलसेट होती रही। हत्ता कि भैं-भैं रू-रू झटक-पटक तक हुई । मगर हम सदैव उनका साथ देते आए हैं और देते रहेंगे।

खै़र चलिए आगे चलते हैं।
जी हाँ, तो पहेली के जज, बिगब्रदर समीर-लाल जी ने सभी जवाबों का महीनता से अवलोकन करके पहेली का नतीजा घोषित कर दिया है।


हमारे साथ ज़ोरदार तालियों से जीतने वालों का स्वागत कीजिए
जी हाँ तो लीजिए इस रीमिक्स पहेली के

विजेता हैं :

हम सब के प्रिय स्मार्ट इण्डियन जी




इन्होंने पहेली कुछ इस अंदाज़ में बूझी :-

बवाल जी,
पहला इनाम तो गया पहली टिप्पणी में मगर दुसरे का दावा तो किया जा सकता है. यह तो सीमा जी की प्रसिद्ध रचना है. आपके सारे प्रश्नों के जवाब यहाँ पर हैं:
http://mairebhavnayen.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html

अरे भैया, ऐसे तो हम हर परीक्षा पास कर लेते परीक्षा लेने वाले से यह कहकर, कि आपके इन सारे प्रश्‍नों का जवाब हमारे निसाब (कोर्स) की फ़लाँ फ़लाँ पुस्तक में हैं। हा हा। मगर फिर भी आपने यह ज़हमत उठाई और सही जगह पहुँचे इसीलिए ख़िताब हुआ आपके नाम।


प्रजेता हैं:

परम आदरणीया सुश्री सीमा गुप्ता जी




इन्होंने पहेली कुछ इस अंदाज़ में बूझी :-
ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ah ah ah ha ha ha ha .................ha ha ha ha ha ha ha


उनका मतलब यह था कि आप हँसिए मत, बड़ी कठिन पहेली है। उत्तर जो कि मालूम है मगर यदि देती हूँ तो लोग कहेंगे-- आँ ssss ख़ुद का गीत तो कोई भी पहचान जाता। यदि नहीं देती हूँ तो लोग कहेंगे ख़ुद का गीत ही भूल गए। हा हा।


वे विशाल हृदय हैं, इसीलिए बवाल से नाराज़ भी नहीं हुईं कि उनका  इतना सुन्दर गीत क्यों इस तरह तोड़ा-मरोड़ा ?
इसीलिए हमारी जुगलबंदी उनका तहेदिल से आभार प्रकट करती है कि उन्होंने पहेली की रोचकता बनाए रखने में हमें सहयोग दिया।
Rewards

और हमारे हृदय-विजेता हैं सर्वादरणीय-सर्वश्री :-
शशिकांत ओझा जी
समयचक्र वाले महेंद्र मिश्रा जी
राज सिंह जी
दिनेशराय द्विवेदी जी
नीरज गोस्वामी जी
राज भाटिया जी
समीर लाल जी
निर्मला कपिला जी
बेनामी जी
ताऊ रामपुरिया जी
अनूप शुक्ल (फ़ुरसतिया जी)
सुश्री अल्पना वर्मा जी
ज़ाकिर अली रजनीश जी
गिरीश बिल्लोरे ‘मुकुल’ जी
डॉ. मनोज मिश्र जी
मुरारी पारीक जी
अरविंद मिश्रा जी
ललित शर्मा जी
निर्झर’नीर जी
किसलय जी

और ये हैं रीमिक्स पहेली के सही जवाब :-


१) किस ब्लॉगर ने लिखी ?
          सुश्री सीमा गुप्ता


२) किस ब्लॉग पर लिखी ?
      http://mairebhavnayen.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html


३) किस तारीख को लिखी ?
      ६ दिसंबर २००८


४) रचना की पहली लाइन क्या है ?
        हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,


और पूरा ख़ूबसूरत गीत यह है :

हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,
साजों मे भी अब तार नही..
बिखरी हुई रचनाएँ हैं सारी,
शब्दों मे भी वो सार नही...
जज्बातों का उल्लेख करूं क्या ,
भावों मे मिलता करार नही...
तुम अनजानी अभिलाषा मेरी,
क्यूँ सुनते मेरी पुकार नही ...
हर राह पे जैसे पदचाप तुम्हारी ,
रोकूँ कैसे अधिकार नही ...
तर्ष्णा प्यासी एक नज़र को तेरी,
मिलने के मगर आसार नही.....


***

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मेरे सपनों का एग्रिगेटर (बवाल)

हाय,
ये भी कोई बात है मैथिली जी, कि दुनिया भर को अपनी बात कहने का मंच देने वाले होकर भी विजय पर्व पर हार मान बैठे। वो भी इसीलिए माननी पड़ी कि आपकी ब्लॉगवाणी ब्लॉग मंच से हटकर एक युद्ध क मैदान बन पड़ी थी। आज सबसे अधिक पसंद प्राप्त, आज सबसे ज्यादा पढ़े गए, आज सबसे ज्यादा टिप्पणी प्राप्त आदि आदि। मगर आज का सबसे बेहतर चिट्ठा ? वो कहाँ ? चाहे उस पर कोई पसंद, कोई टीप, कोई पठन ना हो। इस चक्कर में कुछ स्तरीय बातें नज़र से छूट जाती थीं। खै़र अब तो मट्की फूट गई। मगर ये मट्की क्यूँ फूटी ?
काश के कोई ऐसा एग्रीगेटर होता के-
१) जो अल्फ़ाबेटिकली अरेंज्ड होता।
२) दिन भर में २४० पोस्टों से ऊपर प्रदर्शित ही ना करता।
३) एक ब्लॉगर को हफ़्ते में एक ही दिन पोस्ट करने देता।
४) ब्लॉग को जिसने भी पढ़ा उसे टिप्पणी कार मानता।
५) पसंद नापसंद के लिए अलग से विशिष्ट टीप की व्यवस्था रहती।
६) सबसे ज़्यादा और सबसे कम का दिल छोटा करने वाला कोई पैमाना ही ना होता।
७) ब्लॉग महज़ ब्लॉग रहता, कोई प्रतियोगिता, पसंद, श्रेष्ठता और पहेली की वस्तु ना रहता।
काश के ऐसा होता ।
काश के ऐसा के ही हो।
आज ब्लॉगवाणी भी शोले के धरम प्राजी जैसे टंकी पर चढ़ चुकी है। लेकिन ये भी सच है के जब गुस्सा उतर जाएगा तब ये भी उतर आएगी। और आप कोई हिन्दी ब्लॉगिंग पर एहसान नहीं कर रहे थे मैथिली जी या सिरिल जी, बल्कि अपना कर्तव्य निभा रहे थे। तो क्या इस यज्ञ में हम आपके साथ नहीं थे। अब भी हैं। कम बैक जी।
फ़ोन बंद कर देने से क्या बात बंद हो जाएगी। ये वो निकली है जो अब दूर तलक जाएगी। दीवार फ़िल्म के उस डायलॉग को याद कीजिए के "जिसने तेरे हाथ पर यह लिख दिया के मेरा बाप चोर है" वो तेरा कौन था ?
पसंद नापसंद के चट्कों से दुनिया नहीं चलती । वो तो चलती है मोहब्बती उसूलों से ।
चलते चलते नीरज के उस गीत को चलिए फिर याद कर लें--
ऎसी क्या बात है चलता हूँ अभी चलता हूँ गीत इक और ज़रा झूम के गा लूँ तो चलूँ ।

सोमवार, 1 जून 2009

अपनी हदों को वापस........ (बवाल)

आलम को ज़द में लेकर, फिर मैं सम्भल पड़ा हूँ !
अपनी हदों को वापस, फिर मैं निकल पड़ा हूँ !!
--- बवाल
आलम = दुनिया
ज़द = रेंज
आदरणीय समीर लाल (उड़न तश्तरी) की मशहूर किताब "बिखरे मोती" के अंतरिम विमोचन के ज़माने से ही हम गायब पाए जाते रहे हैं। शिकायत भी लोगों की रही की उस मशहूर किताब में भी हम गायब ही पाये गये। अमाँ वो हमारे सबसे ज्यादा चाहने वाले हैं, क्या ये काफ़ी नहीं ? ज़रूरी है कि एलानिया परचम सरे-बज़्म लहराए जाएँ। चिरौरी से लेकर फट्कार तलक हमें इस दुनिया में समीर भाई के अलावा कभी किसी की ना पसंद आई ना आवेगी। इसलिए हमारे लिए उनकी मोहब्बत से बढ़कर कुछ नहीं। सबसे पहले उन्हें उनकी ३०० वीं पोस्ट के लिए और ११ हज़ार टिप्पणियों के लिए ढेर सारी बधाइयाँ। नामालूम कितने हवाई ख़त आकर जी-मेल के बक्से में पड़े थे। उन ख़तों में अपने लिए लोगों की इतनी मोहब्बत देखकर आँखें नम हो गईं। दिल की बीमारी से लड़ पड़ने की ताक़त यहीं से तो मिल जाती है जी हमको। ज़्यादा बैठ नहीं पाते अब कम्प्यूटर पर। बिखरे मोती के विमोचन के बाद ज़बरदस्त फ़ूड पोइज़िनिंग हुई। १० दिनों में हालत बदतरीन । ठीक होते ही पूना गाड़ी दौड़ाई। अजीब मसरूफ़ियत में दिन गुज़रे। वहाँ से दक्कन का सफ़र जो अब तक चल रहा है। खै़र, ये सारे अहवाल अगली पोस्टों में। आदरणीय दिनेशराय जी के पुत्र वैभव से जबलपुर में ना मिल पाए क्यों उस दिन हम पणजी में थे, माफ़ी चाहेंगे उनसे।मेल ही बड़ी लेट देख पाए सर। खै़र आपका फ़ोन नम्बर फ़ीड कर लिया है, बात ज़रूर करेंगे पूना पहुँच कर। बैलेंस कम है और यहाँ का रीचार्ज कूपन हमारे मोबाइल को लगता ही नहीं। हा हा।
भाई मुकुल, प्रिय अर्श, विवेक सिंह, सलिल साह्ब, प्रेम भाई, किसलय जी, डूबे जी, फ़ुरसतिया जी, राज सिंह जी, अनुपम जी, प्राण जी, महावीर जी, महेन्द्र मिश्रा जी, परम प्रिय समीर लाल जी, ताऊ जी, राज जी, विनय जी, सीमाजी, भूतनाथ जी, गौतम जी और ना जाने कितने ही अपनों ने याद किया बार बार। आप सभी का बहुत बहुत आभार और बारम्बार माफ़ी की दरकार। कर्नाटक के मंगलूर के एक गाँव नीरमार्ग जो इत्तेफ़ाक से हमारी ससुराल भी हुआ करती है से ये पोस्ट कर रहे हैं । बड़ी मुश्किल से हमारे साले साहब ने कहीं से डाटा कार्ड का इंतज़ाम कर दिया है, उनका भी आभार। शेष अगले अंक में.......
........ बवाल

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

तामीले-हुक्म (मुकुलजी, समीरलालजी, सीमा गुप्ताजी, और ताऊजी का) ---बवाल

आज जब हम प्रिय भाई "मुकुल" के ब्ला॓ग पर गए, तो ख़ुद के लिए एक प्यारे से हुक्म को सैर करते पाया। "बवाल भाई इसे पूरा करें"। हम घबराए के हमसे क्या अधूरा रह गया जी ? जब नीचे लिखी ये चतुश्पदियाँ देखीं तो माजरा समझ आया। और उस पर टिप्पणियों में आदरणीय समीरलाल जी, सीमाजी, और ताऊजी का स्नेह भरा आग्रह, कतई टालते न बना।

वैसे ज़रा "मुकुल" भाई के द्वारा रचित ये सुन्दर चतुश्पदियाँ देखिए। हमें तो ये कहीं से अधूरी नहीं लगीं :-
माना कि मयकशी के तरीके बदल गए
साकी कि अदा में कोई बदलाव नहीं है!
गर इश्क है तो इश्क की तरहा ही कीजिये
ये पाँच साल का कोई चुनाव नहीं है ?
********************************
गिद्धों से कहो तालीम लें हमसे ज़रा आके
नौंचा है हमने जिसको वो ज़िंदा अभी भी है
सूली चढाया था मुंसिफ ने कल जिसे -
हर दिल के कोने में वो जीना अभी भी है !
********************************
यूँ आईने के सामने बैठते वो कब तलक
मीजान-ए-खूबसूरती, बतातीं जो फब्तियां !
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-------------------------------------?
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मगर अब जब आप सब प्रियजन इतना फ़ोर्स कर ही रहे हैं, तो लीजिए कुछ इस तरह से इनमें हम भी शामिल हुए जाते हैं जी---
माना कि मैकशी के तरीक़े बदल गए
साक़ी कि अदा में कोई, बदलाव नहीं है !
गर इश्क़ है तो इश्क़ के मानिंद कीजिये
ये पाँच साल का कोई, चुनाव नहीं है !!
**************************************
गिद्धों ज़रा तालीम लो, फिर से कहीं जाके,
नोंचा था तुमने जिसको परिंदा, अभी भी है !
सूली चढ़ा दिया था जी, मुंसिफ़ ने कल जिसे,
वो दिल के कोने में कहीं ज़िंदा, अभी भी है !!
**************************************
यूँ आईने के सामने, टिकते वो कब तलक ?
मीज़ान-ए-हुस्न कस रहा था उनपे फब्तियाँ !
फबने का ज़माना भी था, उनका कभी कहीं,
पर अब तो सज रही हैं, झुर्रियों की ख़ुश्कियाँ
*****************************************
आग़ाज़ को अंजाम पे, आने तो दीजिए
दिल में ज़रा बवाल, मचाने तो दीजिए
है इश्क़ में अब भी हमारे, वो ही दम-ओ-ख़म
नज़रों से नज़र आप, मिलाने तो दीजिए
****************************************
मुकुलजी, समीरलाल जी, सीमा गुप्ता जी और ताऊ रामपुरिया जी के साथ-साथ सभी ब्ला॓गर बंधुओं को इस प्रिय आग्रह के लिए बहुत बहुत आभार सहित
---बवाल

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

लिखा जो ख़त तुझे.......................(बवाल)

ब्ला॓गिस्ताँ के प्रियजनों,

निम्नलिखित प्रेम-पत्र, हमने अपनी गर्लफ़्रैण्ड को १४ फ़रवरी सन १९८८ को लिखा था। आप भी मुलाहिजा फ़रमाइए, हँसियेगा कतई नहीं---
प्रिय ............,
तुम्हें इतना सारा प्यार के जितना ......
राम को सीता से, कृष्ण को राधा से, जहाँगीर को अनारकली से, शाहजहाँ को मुमताज़ से,
रोमियो को जूलियट से, राँझा को हीर से, मजनूँ को लैला से, महिवाल को सोहनी से, इन्द्र को उर्वशी से, नल को दमयंती से......,
बहादुरों को तलवार से, नाविक को पतवार से, नर्तकी को पायल की झंकार से, कला को कलाकार से, अदा को अदाकार से, फ़न को फ़नकार से, दुश्मनी को तकरार से, मोहब्बत को इक़रार और इंतज़ार से, दिल को दिलदार से, योद्धा को धनुष की टंकार से.....,
पंथी को डगर से, बाँध को नहर से, सागर को लहर से, प्रदूषण को शहर से, निराश को ज़हर से, क़यामत को कहर से.....,
चावल को दाल से, मछुआरे को जाल से, पंछियों को डाल से, कंजूस को माल से,
बुढ़ापे को काल से, ठगों को चाल से, तबलची को ताल से, दलाली को दलाल से, मुसीबत को तंगहाल से, गायक को ख़याल से, चुंबन को गाल से.....,
चालक को गाड़ी से, सिक्ख को दाढ़ी से, स्त्रियों को मँहगी साड़ी से, पियक्कड़ों को ताड़ी से...,
पर्वतारोही को पहाड़ों की चोटी से, कुत्ते को बोटी से....,
मनुष्य को आज़ादी से, पोतों को दादी से, युद्ध को बरबादी से, युवाओं को शादी से...,
पराक्रम को हनुमान से, कर्ण को दान से, संगीत को कान से, बादशाहों को आन से, नवाबों को शान से, आदमी को जान से, भगत को भगवान से, शहीदों को बलिदान से, गाँधी को हिन्दुस्तान से....,
अंधविश्वासी को वहम से, गँजेड़ी को चिलम से, घायल को मलहम से, लेखक को क़लम से,
और जी हाँ आपको हम से .........................
..................................
प्यार है।
आप मेरी शाइरी, आपकी क़सम
जोड़ी मेरी आपकी ख़ूब रहेगी जम
आप मेरे साथ हैं, तो कुछ नहीं है ग़म
एक तन, एक दिल, एक जान हों हम
आप मेरी ज़िंदगी का नूर हो सनम
रात १२.०० बजे १४ फ़रवरी १९८८
जबलपुर
पूछिए के फिर क्या हुआ ?
अरे फिर होना क्या था, उस समय दोनों के घर वाले ही (राम सैनिक) बन गए।
बाद को हमने फिर प्रयास किया एक और अतिसुन्दर कन्या को यह पत्र देने का ---

संकोच ही करते रह गए भैया और उनकी शादी कहीं और तय कर दी गई।
ये इत्तेफ़ाक भी है कि उनकी और हमारी शादी एक ही तारीख़ और एक ही वक्त पर हुई।
और उन्हें अब तक पता नहीं
और अंत में जिन्हें ये ख़त दिया उन्हें उस ज़माने में हिन्दी ही नहीं आती थी, मगर
दिल की ज़बान भली भाँति समझती थीं वो....
जी हाँ ठीक समझे आप ..... बवालिन ही हैं ये

और इसलिये तब से अब तक यही साथ देती रहीं और आगे भी संभावना नज़र तो आ रही है, अगर हमने ये ख़त किसी और को नहीं दिया तो .....हा हा

आप सभी को वेलेण्टाइन डे पर बहुत बहुत मुबारकबादियाँ

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

क्यूँ है..........?

वही हमारे वही तुम्हारे, तो फिर मचा ये बवाल क्यूँ है ?

मेरे शहर की बुलंदियों की, ये हद से गिरती मिसाल क्यूँ है ?

सोमवार, 26 जनवरी 2009

गणतंत्र दिवस पर शर्मिंदगी......... (लाल-एन-बवाल)

सना करें औ सलामियाँ हों , है सद्र शर्मिंदगी कहीं कुछ ?

फ़तह का सामाँ दिखा रहे हों, के टाटे-पैबंदगी सभी कुछ !!

--- समीर 'लाल 'और 'बवाल

शब्दार्थ :-
सना = स्तुति, वन्दना, प्रशंसा
सलामियाँ = गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड

सद्र = राष्ट्रपति और तमाम सियासतदाँ
फ़तह का सामाँ = हथियार, शस्त्र, विमान, टैंक, तोपें, मिसाइलें, असलहा
टाटे पैबंदगी = मख़्मल में टाट का पैबंद लगाना

भावार्थ :- सदियों से चले आ रहे आतंकवाद और तिस पर हालिया बम्बई (हमें मुम्बई कहना पसंद नहीं) की घटनाओं के बाद कुछ भी न कर पाने के बाद तो, गणतंत्र दिवस पर हमें तो बड़ी शर्म आ रही है परेड करते हुए। कैसे कहें, पराजित हिंद को जयहिंद ? बतलाइए ?

रविवार, 18 जनवरी 2009

फ़ुरसतों में .............. (बवाल)



ज़रा सा इनकी तरफ़ तो देखो, हैं दोनों आलम सँभाल रक्खे

औ’ तुमने पहली ही फ़ुरसतों में, उबल-उबल कर बवाल रक्खे

---बवाल

निहित शब्दार्थ :- दोनों आलम = चल (मूक श्वान) - अचल (शिला), तुमने = मानव ने, उबल उबल = असंतुलित वाणी

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

कौन कहता है के .........

पिछले ११ सितम्बर की पोस्ट के बाद कुछ लिखने का वक्त ना मिल पाया । क्या बतलायें थोड़ी बहुत वक़ालत भी तो करनी पड़ जाती है न इस ब्रॉड बैंड के बिल का ख़र्च निकालने के वास्ते। पर इस गैप पर कुछ दोस्त घबराकर पूछ बैठे । क्या बात है ? मर मिटे क्या नाइन इलेवन पर ? हो तो जल्दी नज़र आओ भाई ।
उनकी शंका समाधान के लिए किसी शायर के ये शेर शायद पसंद आयें -

कौन कहता के, मौत आई तो मर जाऊंगा ?
मैं तो दरिया हूँ, समंदर में उतर जाऊंगा !!

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल, तो ठहर जाऊंगा !
वरना खु़द्दार मुसाफ़िर हूँ, गुज़र जाऊँगा !!

शनिवार, 6 सितंबर 2008

इंडिया देट इज़ भारत विच इस नॉट हिन्दुस्तान

कुछ दिन पहले समीरलाल जी के बारे में एक पोस्ट पर श्री संजय बेंगाणी जी ने टिप्पणी देते हुए पूछा था के लाल-एन-बवाल के उपरोक्त शीर्षक का अर्थ समझाया जावे । दरअस्ल हम इसी इंतज़ार में थे के कोई तो हो जो इस बात को पकड़ ले और संजय जी ने आख़िर वो काम कर दिया । अब सवाल यह है के बात छोटी नहीं बहुत मोटी है। लम्बी है। गहरी है। ऊँची है। ना जाने क्या क्या है। इसीलिये जम जम कर होगी । और सब मिलकर करेंगे । क्या मीतजी, नीरजजी, डॉक्टर अमर, सीमाजी, दिनेशजी, रख्शंदा जी, महेंद्र मिश्राजी, हमारे अन्य प्रिय ब्लोग्गेर्स और हाँ हाँ महामना समीरलाल जी इस चर्चा में जुटना पसंद करेंगे ? कविराज राकेश जी इस बारे में क्या सोचते हैं देखते हैं। हमें सब चाहिए, हाँ सब के सब चाहिए । क्योंके आप सब लश्करे-हिंद के जवान हैं । हो सकता है कुछ नया निकल कर बाहर आवे । हो सकता है बवाल हो । और या फिर कमाल हो।

----क्या कहें दीदावरी किस दर्जा हैरानी में है ?
आजकल खुर्शीद इक जुगनू की दरबानी में है !

खुर्शीद = सूरज