गुरुवार, १९ नवम्बर २००९

मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे .............(बवाल)



आलाप:- जो अल्लाह से आग़ाज़ करे, और गणपति से भी शुरू करे !
उसका हर काम सफल साईं, प्रभु यीशू वाहे गुरू करे !!

नफ़रत की रातों को बना दे, मुहब्बत की सुबे (सुबह)
ऐसा एक इंसान है ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे


कोरस :- हर हर महादेव, अल्लाहो-अकबर, जो बोले सो निहाल,
Praise the Lord Jesus, नानक को, अपना है सत श्री अकाल


१) आपस मे लड़वाने को, हर कोई है तैयार
समझो इनकी साज़िश को, आँखें खोलो यार
समझाता है ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे

कोरस :- हर हर महादेव, अल्लाहो-अकबर, जो बोले सो निहाल,
Praise the Lord Jesus, नानक को, अपना है सत श्री अकाल

२) नूह की नाव का क़िस्सा क़ुरआन में, बाइबिल में जो है,
मत्यवतार में मनू ऋषि की, नाव वही तो है
सिद्ध कर रहा ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे

कोरस :- हर हर महादेव, अल्लाहो-अकबर, जो बोले सो निहाल,
Praise the Lord Jesus, नानक को, अपना है सत श्री अकाल

३) हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सबका मालिक एक
एक नज़र से वो हम सबको, रहा है प्यारे देख
दिखलाता है ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे

कोरस :- हर हर महादेव, अल्लाहो-अकबर, जो बोले सो निहाल,
Praise the Lord Jesus, नानक को, अपना है सत श्री अकाल

नफ़रत की रातों को बना दे, मुहब्बत की सुबे
ऐसा एक इंसान है ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे

शनिवार, ३ अक्तूबर २००९

तुहमत वो हम पर...............(बवाल)

आपकी तारीफ़ में, जो हम क़सीदे पढ़ चले
तालियों के सिलसिले, तड़ तड़ तड़ा-तड़ तड़ चले

उल्फ़तों की राह में, जो हम ज़रा सा बढ़ चले
बस, ज़माने भर की नज़रों में, सरासर गड़ चले

हम परिन्दे थे, ज़माना बेरहम सैयाद था
क़ैद में भी पर हमारे, फड़ फड़ा-फड़ फड़ चले

वो झलक थी आपकी, जिस पर मिटा सारा जहाँ
छिप के भी धड़कन हमारी, धड़ धड़ा-धड़ धड़ चले

वो अदब का क़त्ल था, जो सारा आलम लाल था
और ‘बवाल’-ए-बज़्म की तुहमत, वो हम पर मढ़ चले

---बवाल

मंगलवार, २९ सितम्बर २००९

मेरे सपनों का एग्रिगेटर (बवाल)

हाय,
ये भी कोई बात है मैथिली जी, कि दुनिया भर को अपनी बात कहने का मंच देने वाले होकर भी विजय पर्व पर हार मान बैठे। वो भी इसीलिए माननी पड़ी कि आपकी ब्लॉगवाणी ब्लॉग मंच से हटकर एक युद्ध क मैदान बन पड़ी थी। आज सबसे अधिक पसंद प्राप्त, आज सबसे ज्यादा पढ़े गए, आज सबसे ज्यादा टिप्पणी प्राप्त आदि आदि। मगर आज का सबसे बेहतर चिट्ठा ? वो कहाँ ? चाहे उस पर कोई पसंद, कोई टीप, कोई पठन ना हो। इस चक्कर में कुछ स्तरीय बातें नज़र से छूट जाती थीं। खै़र अब तो मट्की फूट गई। मगर ये मट्की क्यूँ फूटी ?
काश के कोई ऐसा एग्रीगेटर होता के-
१) जो अल्फ़ाबेटिकली अरेंज्ड होता।
२) दिन भर में २४० पोस्टों से ऊपर प्रदर्शित ही ना करता।
३) एक ब्लॉगर को हफ़्ते में एक ही दिन पोस्ट करने देता।
४) ब्लॉग को जिसने भी पढ़ा उसे टिप्पणी कार मानता।
५) पसंद नापसंद के लिए अलग से विशिष्ट टीप की व्यवस्था रहती।
६) सबसे ज़्यादा और सबसे कम का दिल छोटा करने वाला कोई पैमाना ही ना होता।
७) ब्लॉग महज़ ब्लॉग रहता, कोई प्रतियोगिता, पसंद, श्रेष्ठता और पहेली की वस्तु ना रहता।
काश के ऐसा होता ।
काश के ऐसा के ही हो।
आज ब्लॉगवाणी भी शोले के धरम प्राजी जैसे टंकी पर चढ़ चुकी है। लेकिन ये भी सच है के जब गुस्सा उतर जाएगा तब ये भी उतर आएगी। और आप कोई हिन्दी ब्लॉगिंग पर एहसान नहीं कर रहे थे मैथिली जी या सिरिल जी, बल्कि अपना कर्तव्य निभा रहे थे। तो क्या इस यज्ञ में हम आपके साथ नहीं थे। अब भी हैं। कम बैक जी।
फ़ोन बंद कर देने से क्या बात बंद हो जाएगी। ये वो निकली है जो अब दूर तलक जाएगी। दीवार फ़िल्म के उस डायलॉग को याद कीजिए के "जिसने तेरे हाथ पर यह लिख दिया के मेरा बाप चोर है" वो तेरा कौन था ?
पसंद नापसंद के चट्कों से दुनिया नहीं चलती । वो तो चलती है मोहब्बती उसूलों से ।
चलते चलते नीरज के उस गीत को चलिए फिर याद कर लें--
ऎसी क्या बात है चलता हूँ अभी चलता हूँ गीत इक और ज़रा झूम के गा लूँ तो चलूँ ।

मंगलवार, २२ सितम्बर २००९

दिल में .............(बवाल)

वाह, क्या दीवान तेरा, नूर सा फबता हुआ !



जिसमें ख़ुद को पा रहा हूँ, तुझसे मैं कटता हुआ !!



ख़ैर दिल की बात दिल तक ही, रखूंगा यार अब !



और कर भी क्या सकूंगा, मोहरा हूँ पिटता हुआ !!



--- बवाल

गुरुवार, २७ अगस्त २००९

सबब ................(बवाल)

मैं सब्रो-रंगे-सुकून में हूँ , मुझे संभालो मेरे सहारों

सबब है इस इल्तिजा के पीछे, के चल बसा हूँ ओ मेरे यारों

---बवाल

सोमवार, १३ जुलाई २००९

आज महफ़िल में कोई

कभी कभी ये जो आप सबका प्रिय ‘बवाल’ है ना, इसे हमें ‘रय दुष्ट’ कहने का मन किया करता है. पता है क्यों ?

इसका मूडे-मंज़र अजीब ही होता है. ये शायर-वायर टाइप के लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? अब देखिए ना. एक ज़माने में गुरूजी पंकज सुबीर साहब ने, इस साल होली के आसपास की बात है, तरही मुशायरे के लिए एक बहुत ही ख़ूबसूरत मिसरा दिया था- “आज महफ़िल में कोई शम‍अ फ़रोज़ाँ होगी”. और इस पर ब्लागरों से ग़ज़ल कहने का आग्रह किया था.

बाद में उसमें कोई टैक्निकल प्राब्लम के चलते उसकी जगह कुछ और मिसरा-तरह दे दिया गया शायद. लेकिन उसके बदलने के पहले ही हमने इस पर कुछ शेर-वेर लिख-विखा कर अपने भाई ‘बवाल’ को रिफ़र कर दिया था, मात्रा वात्रा के पेंचोख़म सुलझाने के लिए. बात आई गई हो गई. हमारी मेल न जाने उनके बाक्स पर कितने दिन धूल खाती पड़ी रही. अचानक अपनी ससुराल मँगलूर से, भाई साहब ने लौटकर हमें इसका जवाब भेज दिया. आय हाय जवाब की हैडिंग पढ़कर पहले तो ऐसा गुस्सा आया कि क्या बतलाएँ. मगर जवाब तो हमारी गुलों से सजी हुई ग़ज़ल थी, अरे क्रोध-काफ़ूर होते देर न लगी.

हमने उससे पहले तो यही कहा कि "कौन टाइप के हो यार ?”

हमारे इस सवाल का जवाब इन्होंने हमेशा दाँत निपोर कर ही दिया है, मगर वो दंत-निपोरी हमारे लिए अपनेपन से हमेशा लबरेज़ रही है. हा हा.

खै़र हमने फिर कहा- कि भैये वो २१२२ ११२२ ११२२ २२ वगैरह देख लिए के नहीं इसमें ?

तो भाई साहब उल्टा हमीं से पूछ बैठे के ग़ज़ल कहना है या परेड करना है ? १-२, १-२. अब बतलाइए.

हमने कहा- अरे यार मतलब वो फ़ाइलुन-फ़ाइलातुन वातुन क्या क्या होता है वो सब देख लिया ना ?

तो जवाब देते हैं - जानी, हम वक़ील हैं और वक़ील सिर्फ़ फ़ाइल से वास्ता रखता है तुन से नहीं, समझे !

क्या कहें तुम्हें ‘रय दुष्ट कहीं के’ !!! हा हा !

खै़र, आप तो ग़ज़ल पढ़िए और उसकी फ़ाइलिंग देखिए ....... इस जुगलबंदी में वैसे हमारी स्थिति तो बस बंदी वाली ही है बाकि जुगल कौन?

बगीचे से


आज महफ़िल में कोई, शमअ फ़रोज़ाँ होगी
जान-ए-परवाना यूँ तहज़ीब से क़ुर्बां होगी

हमसफ़र दिल से इजाज़त लिए बग़ैर यहाँ
बात आँखों से ख़ुद-बख़ुद ही अब अयाँ होगी

छ्लकते जाम पर फ़लक से जो होगी नाज़िल
वो झलक शोख़-चश्म नूरे-कहकशाँ होगी

फ़सुर्दाहाल पड़ी ज़ीस्त जो बियाबाँ में
क्या ख़बर वो ही आज जश्‍ने-चराग़ाँ होगी

दिल की धड़कन खिंची जाती है उसी की जानिब
बर्क़ हम पर ही सनम आज मेहरबाँ होगी

उसके वाबस्ता भी होकर के जो तन्हा ही रहे
सख़्तजाँ बेबसी की तब तो इन्तेहाँ होगी

एक-मज़हब ही रहेगी तमाम महफ़िल गर
एक मिक़्राज़ दिलों के भी दरमियाँ होगी

कौन किसके क़रीब कितना है ये देखोगे
जब निगहबान के हाथों में गिरेबाँ होगी

वज़ीफ़ा बज़्म में पढ़कर न मचा देना ‘बवाल’
‘लाल’ यूँ भी तुम्हें हासिल वो लामकाँ होगी

---समीर ‘लाल’ और ‘बवाल’ (जुगलबंदी)

फ़रोज़ाँ = प्रकाशमान, तहज़ीब = सभ्यता-शिष्टता, अयाँ = उजागर, फ़लक = आसमान,
नाज़िल = उतरना, शोख़-चश्म = चंचल नैनों वाली, नूरे-कहकशाँ = आकाशगंगा की रौशनी
फ़सुर्दाहाल = खिन्न-मलिन-उदास, ज़ीस्त = ज़िंदगी,
जश्‍ने-चराग़ाँ = दीपोत्सव-दीपावली, बर्क़ = तड़ित-बिजली, वाबस्ता = संबद्ध,
सख़्तजाँ = ज़िद्‍दी, मिक़्राज़ = कैंची, निगहबान = रक्षक,
वज़ीफ़ा = मंत्रजाप, बज़्म = महफ़िल,
लामकाँ = ईश्वर की राजगद्‍दी

शुक्रवार, ३ जुलाई २००९

ख़ुद ही पड़ा ........................(बवाल)

क़ातिल अदा का तेरा, क्या ख़ूब था निभाना !
मैं फ़ौत हूँ ये मुझको, ख़ुद ही पड़ा बताना !!

---बवाल
फ़ौत = मृत