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सोमवार, 1 मार्च 2010

किसिम किसिम की गुलाल................................

किसिम-किसिम की गुलाल लेकर,  हम उड़ चले थे उन्हें लगाने  !




मगर वहाँ से वो उड़ चले थे, तमाम रंगत को ही मिटाने !!



तभी  यकायक से मौसमे-गुल, ने हक़ में अपने जो दी गवाही !



तो हैरत-अँगेज़ रँगे-जन्नत, लगे हमारी ग़ज़ल सजाने !!





आप सभी साहिबान को ईद, होली और हॉकी में हिन्दोस्ताँ की बेहतरीन जीत पर ढेर सारी बधाइयाँ

--- बवाल

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

......... मेरा जहाँ से जाना (हाले-बीमारे-बवाल)

बहुत हिम्मत करके डॉक्टर साहेब से छुपते छुपाते ये पोस्ट लिखवा रहा हूँ मित्रों । पिछली आठ अक्टूबर को एक बहुत ही बेहतरीन मार्मिक पोस्ट "ज़ख्मे- दिल" पढ़ने के बाद टीप करने जा रहा था के दिल में दर्द के साथ अचानक चक्कर आ गया । बाद को वहाँ पाया गया जहाँ कोई जाना पसंद नहीं करता । एक मशीन पर कुछ ग्राफ निकालने के बाद डॉक्टर साहेब ने चिन्तायुक्त शक्ल बनाते हुए कई टेस्ट करवा डाले । एक टी ऍम टी बाकी रह गया है। मुझे घर भी नहीं जाने दे रहे यार । मेरे एक मित्र हैं बड़े अज़ीज़, उन्हीं के लेप टॉप के द्वारा, उन्हीं से टाइप करवा कर आप तक पहुँचने की कोशिश कर रहा हूँ । मुझे आप सब मुआफ़ कर देना जी, तबियत ही साथ नही दे रही । क्या करुँ ? लाल साहेब, सीमाजी, मीतजी, मिश्राजी, नीरजजी, दिनेशजी, राकेशजी, राज सिंघजी, और सभी प्रिय ब्लोग्गेर्स को मैं मिस कर रहा हूँ। पता नहीं अब तक ब्लॉगजगत में क्या कुछ हो चुका होगा ? मुझे वापस बुला लो यार आप सब लोग। अब ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं पड़ रही है, बस चलते चलते एक शेर कहने का दिल कर रहा है सो पेश है जी ---

या मैंने जल्द कर दी, या तूने देर जाना !
तेरा शमा जलाना, औ मेरा जहाँ से जाना !!
-----बवाल
पता नहीं अब कब सबसे मुलाक़ात होगी ? होगी भी या नहीं ऊपरवाले के हाथ सब है ।

रविवार, 13 जुलाई 2008

मोम के बाजू

माननीय अमरसिंह साहेब के अथक प्रयासों पर :-

उसे कह दो के ये ऊँचाइयाँ मुश्किल से मिलती हैं,
वो सूरज के सफ़र में मोम के बाज़ू लगाता है !
-राहत इन्दौरी

गुरुवार, 12 जून 2008

उड़ने वाली चीजों को.......

मुट्ठी में ये भी रखते हैं, उड़ने वाली चीज़ों को !
क्यूँकर नष्ट किया करते हम, इतने प्यारे बीजों को !!


नैतिकता बस छोड़ पढ़ाते, घुड़दौड़न-लड़ना-तरना !
कम्प्यूटर-इंग्लिश-मोबाइल, ड्राइविंग और सर्फिंग करना !!


बचपन में बचपन मुरझाये, ऐसी जुगत लगाते हम !
अदब-क़ाएदा ताक पे रखकर, ज़िन्दा इन्हें बनाते बम !!



इंतिका़म तहज़ीब भी लेगी, देखना इक दिन नस्लों से !
धोना होगा हाथ हमें भी, खड़ी हुई इन फ़स्लों से !!

लाल करें बव्वाल कभी ना, इतना मर्म तो जाने हम !
बहुत हो चुका, चलो चल पड़ें, पालक-धर्म निभाने हम !!