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सोमवार, 18 जुलाई 2011

हुस्ने-क़ुद्रत

मैं हुस्ने-क़ुद्रत बयाँ करूँ क्या ?

असर में होशो-हवास खोया !

नज़ारे जन्नत के इस ज़मीं पर,

सभी हैं मेरे ही पास गोया !!

--- बवाल





शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

माटी की गागरिया................(बवाल)


दुपहरिया बीत चली,

पनघट पर रीत चली !

पनिहारिन फिर लौटी,

भर रस की सागरिया !

माटी की गागरिया !!


--- पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी

!!  हमारे उस्ताद लुक़्मान जी के भी उस्ताद और संस्कारधानी के प्रथम महापौर पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी की पुण्य जयंती १२ जनवरी पर उन्हें

शत् - शत् श्रद्धा-सुमन !!

और

!! आप सबको महाशिवरात्रि पर्व पर ढेर सारी शुभकामनाएँ !!


कचनार सिटी जबलपुर के ७६ फ़ीट ऊँचे शिवजी


भोला नई माने रे नई माने, मचल गए भंगिया (भाँग) पै

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ऐसी क्या बात है ? ...... नीरज

बाद मेरे हैं यहाँ और भी गाने वाले
स्वर की थपकी से पहाड़ों को सुलाने वाले ।
उजाड़ बाग़ बियाबान औ सुनसानों में
छंद की गंध से फूलों को खिलाने वाले ॥
इनके पाँवों के फफोले न कहीं फूट पड़ें
इनकी राहों से ज़रा शूल हटा लूँ तो चलूँ
ऐसी क्या बात है चलता हूँ अभी चलता हूँ
गीत इक और ज़रा झूम के गा लूँ तो चलूँ
---गोपालदास 'नीरज'
(महाकवि के जन्मदिवस पर उन्हें ब्ला॓गजगत की बहुत बहुत शुभकामनाएँ)

बुधवार, 14 जनवरी 2009

लुक़्मान को दिखाना ..... (लाल-एन-बवाल)

क़व्वाले-आज़म तहज़ीबिस्तान
चचा लुक़्मान
हमारे उस्ताद की जयंती
१४ जनवरी १९२५ (मकर संक्राति) पर
न ग़ज़ल है न गीत है प्यारे
आपसी बातचीत है प्यारे
उस्ताद कहाँ और क्यूँ चाहिए ?
ये बतलाने के लिए दो शेर पेश हैं ---
साक़ी-ए-गुलबदन का, अन्दाज़ क़ाफ़िराना
उल्फ़त का भी जताना, दामन का भी बचाना
और तब -
मेरी ग़ज़ल में वाक़ई, इस बार ऐबे-ज़म* है
लगता है अब पड़ेगा, लुक़्मान** को दिखाना

---बवाल

शब्दार्थ :-
* ऐबे ज़म = अश्लीलता का दोष
** लुक़्मान = उस्ताद, इस्लाह देने वाला और एक तरह से हक़ीम लुक़्मान भी जिनके पास हर मर्ज़ की दवा हुआ करती थी ।
पुण्य तिथि - २७ जुलाई २००२

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

पंडित महेंद्र मिश्रा जी १६ सितम्बर की पोस्ट पर टिप्पणी

मिश्रा जी की लेटेस्ट पोस्ट देशप्रेम पर की गई एक बहुत सुंदर विवेचना है।
इस पर इस से ज्यादा क्या कहा जाए ?

प्यासी ज़मीन थी लहू, सारा पिला दिया !
मुझपे वतन का क़र्ज़ था, लो मैंने चुका दिया !!
-क्यामालूम

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

सीमाजी (सीमा गुप्ता की बात निराली)

पिछले कुछ दिनों से एक ब्लॉग बहुत ही खूबसूरती से ब्लागरों का दिल चुरा रहा है। और वो है आदरणीय सीमाजी का ब्लॉग मेरिभावनायें। ब्लागस्पाट। कॉम
देखिये न ४.९.०८ को हिज्र ऐ यार , ५.९.०८ को मंज़िल, ६.९.०८ को सज़ा, ८.९.०८ को कैसे भूल जाए, ९.९.०८ को फ़र्जे इश्क, १०.९.०८ को दरिया की कहानी, ११.९.०८ को आशनाई । कया बात है ! कया कहना ! बहुत खूब ! फ़िल ख़ूब !

बहुत अदब से सीमाजी आपसे बुरा मानने का इख़तियार हम छीनते हैं और आपकी बेखटके, बेरोकटोक, बगै़र किल्लतो-कसरत, बेतहाशा तारीफ़ करने का इख़तियार हम बिना आपकी इजाज़त हासिल करते हैं। आप हमें मुआफ़ रखें।
ज़माने में उसने बड़ी बात कर ली,
ख़ुद अपने से जिसने मुलाक़ात कर ली।

शनिवार, 2 अगस्त 2008

समीरलाल जिंदाबाद

पूना से एक उत्साहित करने वाली ख़बर भी है जी ।
मायूस ना हूजिये हिन्दी ब्लॉगर बाबू ।
वो ये के आपके हरदिल अज़ीज़ समीर लाल साहेब और उनकी उड़न तश्तरी की तारीफ़ों के पुल यहाँ के एकमात्र हिन्दी दैनिक - आज का आनंद ने अपनी संपादकीय में बांधे हैं जी । वो भी आज ही । मैंने पेपर सहेज कर रख लिया है।
बा आवाज़े बुलंद है परचमे-हिंद !
है ना बोलो बोलो ।

शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी की लेटेस्ट पोस्ट पर टिप्पणि

लाल मदारी डुग-डुग लेकर, खेल दिखाने आता है !
खेल-खेल में बड़ी-बड़ी बातें, कर जाने आता है !
हाँ बतलाने, हाँ गिनवाने, हाँ मिलवाने आता है !

हिक़मत, हिम्मत, हैरत से हँस-रंग सजाने आता है !!

और इनकी आँखों के वास्ते "जोश" से --

ये बात, ये तबस्सुम, ये नाज़, ये निगाहें !
आख़िर तुम्हीं बताओ, क्यूँकर न तुमको चाहें ?