मंगलवार, 16 सितंबर 2008

कौन कहता है के .........

पिछले ११ सितम्बर की पोस्ट के बाद कुछ लिखने का वक्त ना मिल पाया । क्या बतलायें थोड़ी बहुत वक़ालत भी तो करनी पड़ जाती है न इस ब्रॉड बैंड के बिल का ख़र्च निकालने के वास्ते। पर इस गैप पर कुछ दोस्त घबराकर पूछ बैठे । क्या बात है ? मर मिटे क्या नाइन इलेवन पर ? हो तो जल्दी नज़र आओ भाई ।
उनकी शंका समाधान के लिए किसी शायर के ये शेर शायद पसंद आयें -

कौन कहता के, मौत आई तो मर जाऊंगा ?
मैं तो दरिया हूँ, समंदर में उतर जाऊंगा !!

ख़ुद पुकारेगी जो मंज़िल, तो ठहर जाऊंगा !
वरना खु़द्दार मुसाफ़िर हूँ, गुज़र जाऊँगा !!

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

सीमाजी (सीमा गुप्ता की बात निराली)

पिछले कुछ दिनों से एक ब्लॉग बहुत ही खूबसूरती से ब्लागरों का दिल चुरा रहा है। और वो है आदरणीय सीमाजी का ब्लॉग मेरिभावनायें। ब्लागस्पाट। कॉम
देखिये न ४.९.०८ को हिज्र ऐ यार , ५.९.०८ को मंज़िल, ६.९.०८ को सज़ा, ८.९.०८ को कैसे भूल जाए, ९.९.०८ को फ़र्जे इश्क, १०.९.०८ को दरिया की कहानी, ११.९.०८ को आशनाई । कया बात है ! कया कहना ! बहुत खूब ! फ़िल ख़ूब !

बहुत अदब से सीमाजी आपसे बुरा मानने का इख़तियार हम छीनते हैं और आपकी बेखटके, बेरोकटोक, बगै़र किल्लतो-कसरत, बेतहाशा तारीफ़ करने का इख़तियार हम बिना आपकी इजाज़त हासिल करते हैं। आप हमें मुआफ़ रखें।
ज़माने में उसने बड़ी बात कर ली,
ख़ुद अपने से जिसने मुलाक़ात कर ली।

कानी ला भाऊ नई कानी बिना राहू नई (रजिया का बाप मरा .....)

उड़नतश्तरी पिछले दो दिन के लिए गा़यब हुई क्षुब्ध वुब्ध वाली स्टाइल में ।
लोग परेशान हो गए के भैये कहाँ गए ? और हम उस वक्त शोले पिक्चर देख रहे थे जहाँ अमित जी जो के उन दिनों अमिताभ कहलाते थे डायलोग मार रहे थे --- हाँ देखा कुछ नहीं होगा जब फ़लानी चीज़ उतरेगी तो ये भी उतर आएगा । देखा ! उतर आई ना । अरे भाई क्लासिक चीज़ों और हरदिल अज़ीज़ों में यही तो ख़ूबी है । चाहने वालों से दूर रह ही नहीं सकते। छतीसगढ़ में कहावत ही है के कानी ला भाव नई औ कानी बिना रहू नई । याने अब हटाइए । मीठी नींद फ़रमाइए ।