मंगलवार, 29 जुलाई 2025

नाग-पञ्चमी (चन्दन चाचा के बाड़े में)

बरसों पहले पाठ्य पुस्तक निगम की स्कूली शिक्षा की हिंदी बाल-भारती में एक टंग-ट्विस्टर कविता हुआ करती थी। बच्चों और मास्साबों-बहनजियों को भी पढने-पढ़ाने में बड़ा मज़ा आया करता था। इंटरनेट पर इस कविता को लोगों ने बतौरे-याद कई जगह प्रस्तुत किया, मगर कहीं भी सही अनुक्रम में और पूरी कविता सुनने या पढने नहीं मिली। इत्तेफ़ाक से हमें वो पुरानी बाल-भारती ही मिल गई जिसमें यह सम्पूर्ण कविता थी। पढ़कर बचपन की यादें ताज़ा हो गईं। सोचा की क्यों ना इसे आप सब से शेयर किया जाए। फिर ये भी लगा के जब शेयर करेंगे तो लोग कहेंगे कि गा के सुनाते तो और आनंद आता। अतः इसे संगीत-बद्ध करके गाया, रिकॉर्ड किया, वीडियो भी बनाया और यूट्यूब एवं अन्य म्यूजिक चैनलों पर रिलीज़ किया। लीजिए आज नाग-पञ्चमी के शुभ अवसर पर आप सबके लिए प्रस्तुत है :- बाल-भारती की वो सम्पूर्ण मशहूर कविता आपके मित्र बवाल हिन्दवी की आवाज़ में :- (नीचे दिए गए लिंकों पर ऑडियो सुनिए एवं वीडियो ज़रूर देखिए, शायद पसंद आए ) 


नाग-पञ्चमी 

(चन्दन चाचा के बाड़े में)


सूरज के आते भोर हुआ, लाठी लेझिम का शोर हुआ ।

यह नाग पंचमी झम्मक-झम, यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम ।।

 

मल्लों की जब टोली निकली, यह चर्चा फैली गली-गली ।

कुश्ती है एक अजब ढंग की, कुश्ती है एक ग़ज़ब रंग की ।

यह पहलवान अम्बाले का, यह पहलवान पटियाले का ।

ये दोनों दूर विदेशों में, लड़ आए हैं परदेशों में ।

उतरेंगे आज अखाड़े में, चंदन चाचा के बाड़े में ।।

 

सुन समाचार दुनिया धाई, थी रेलपेल आवाजाई ।

देखो ये ठठ के ठठ धाए, अटपट चलते उद्भट आए ।

थी भारी भीड़ अखाड़े में, चन्दन चाचा के बाड़े में ।।

 

देखो दो बांके शूर चले, देखो नज़रों के नूर चले ।

जब झूम झूम कर चलते थे,  दो गज-शिशु विचल मचलते थे ।

वे भरी भुजाएँ, भरे वक्ष, वे दाँव-पेंच में कुशल-दक्ष ।

जब मांसपेशियां बल खातीं, तन पर मछलियाँ उछल आतीं ।

कुछ हँसते से मुस्काते से, मस्ती का मान घटाते-से ।

मूँछों पर ताव जमाते से, अलबेले भाव जगाते से ।

वे गौर-सलोने रंग लिये, अरमान विजय का संग लिये ।

दो उतरे मल्ल अखाड़े में, चंदन चाचा के बाड़े में ।।

 

दोनों की जय बजरंग हुई, तब दर्शक-टोली दंग हुई ।

दो हाथ मिले दृग चार हुए, तन से मन से तैयार हुए ।

जब एक पैंतरा हुआ उधर, दूसरा पैंतरा हुआ इधर ।

तालें ठोकीं, हुंकार उठी, अजगर जैसी फुंकार उठी ।

लिपटे भुज से भुज अचल-अटल, दो बबर शेर जुट गए सबल ।

बजता ज्यों ढोल-ढमाका था, भिड़ता बांके से बांका था ।

यों बल से बल था टकराताथा लगता दांव उखड़ जाता ।

जब मारा कलाजंघ कस कर, सब दंग कि वह निकला बच कर ।

बगली उसने मारी डट कर, वह साफ़ बचा तिरछा कट कर ।

दंगल हो रहा अखाड़े में, चंदन चाचा के बाड़े में ।।

 

दोनों लड़ते थे थम-थम कर, दोनों भिड़ते थे जम-जम कर ।

हो रहे पेंच जाने-माने, कोई ना गिरा चारों खानें ।

घिस्से की मार गर्दनों पर, जब जोश चढ़ा मर्दानों पर ।

फिर खीज बढ़ी फिर जोश बढ़ा, हल्ले-गुल्ले का लोभ बढ़ा ।

 फिर पकड़-पकड़ फिर उठा-पठक, इसने दाबा वह गया सटक ।

फिर अगल बगल से वार हुए, फिर हाथ-सजग दो-चार हुए ।

जब यहाँ चली टंगड़ी अंटी, बज गई वहाँ घन-घन घंटी।

भगदड़ मच गई अखाड़े में, चंदन चाचा के बाड़े में॥

***


यूट्यूब का लिंक:



यूट्यूब म्यूज़िक लिंक:



अब उपलब्ध है सभी म्यूज़िक प्लेटफॉर्म्स पर:
https://distrokid.com/hyperfollow/bavaalhindvee/naag-panchmi-kushti-chandan-chacha-ke-baade-mein


काश वो संपेरों की बीन फिर सुनाई देने लगे - काश स्कूलों में  और अखाड़ों में उसी उत्साह से कुश्तियाँ लड़ी जाने

लगें - काश नाग पञ्चमी पर फिर वही मजेदार जादूगरी बाजियाँ हों | काश .....

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

भ्रम रोमांचित करता है जब किसी की नई नई तोंद निकलना शुरू होती है तो वो बंदा बड़े दिनों तक डिनायल मोड में रहता है. वह दूसरों के साथ साथ खुद को भी भ्रमित करने की कोशिश में लगा रहता है. कभी टोंकते ही सांस खींच लेगा और कहेगा कहाँ? या कभी कहेगा आज खाना ज्यादा खा लिया तो कभी कमीज टाईट सिल गई जैसे बहाने तब तक बनाता रहता है जब तक कि तोंद छिपाए न छिपे और खुद के बस के बाहर ही न निकल जाए. भ्रम रोमांचित करता है इसलिए यथार्थ से अधिक प्रिय होता है. भ्रम आपको अपने मन के मुताबिक़ खुश होने का मौका देते है. आज की भागती दौड़ती जिंदगी में चंद लम्हें भी ख़ुशी के मिल जाएँ तो मानो जीवन सार्थक हो जाता है और भागते दौड़ते रहने के लिए नई ऊर्जा मिल जाती है.. शायद इसी सोच को पोषित करने हेतु ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल जैसे खेल बनाये गए होंगे. खेल इसलिए कहा क्यूंकि मुझे तो आजतक कोई नहीं मिला जिससे ओपिनियन ली गई हो या वोट डालकर निकलते वक्त किसे ने पूछा हो कि किसको लगा आये? शायद मेरा ही परिचय का दायरा छोटा हो मगर मेरी बातचीत का आधार तो वही हो सकता है. जब हम बचपन में परीक्षा देकर घर लौटते तो अम्मा पूछा करती थी कि पेपर कैसा हुआ? हम वही रटा हुआ जबाब देते की १०० में १०० आना चाहिए, पूरा सही किये हैं. जितना वो हमें जानती थीं उतना ही हम उनको जानते थे तो घर लौटने के पहले तेज बच्चो से सारे प्रश्नों का उत्तर पता करके आते और पूछने पर सही वाला बता देते. इन सब खटकर्मों के पीछे मात्र इतनी मंशा होती कि काहे दो बार पिटना? जब रिजल्ट आएगा तब तो फुड़ाई होना ही है, आज तो इत्मिनान से खेलें और खुश हो लें. रिजल्ट आने पर कह देते थे कि मास्साब से ट्यूशन नहीं पढ़ी इसलिए गलत कॉपी जांच दी है, मानो न जीत पाने का आरोप इवीएम पर लगा रहे हों. मगर अम्मा सब समझती थीं. बाद में जब थोड़ा बड़े होने लगे तो हमारा १०० में से १०० का जबाब सुनकर अम्मा एक मुहावरा बोला करतीं: नाऊ भाई नाऊ भाई कितने बाल.. सरकार दो घड़ी में आगे ही गिरेंगे.. मगर आज के ओपिनियन और एक्जिट पोलक नाऊ इतना सीधा और सच्चा कहाँ बोलते हैं? जब से नाऊ की दुकान पार्लर में बदली है, तब से नाऊ भी स्टाइलिस्ट कहलाने लगे हैं. ये वही कहते है जैसा ग्राहक सुनना चाहता है. पहले का नाऊ मोहल्ले भर के खूफिया किस्से सुनाता था और आज का नाऊ ग्राहक की पसंद के नए गानों की प्ले लिस्ट बजाता है. ओपिनियन और एक्जिट पोलक नाऊ को भी पता है कि बस नतीजे आने को ही हैं फिर भी एक अंतिम बार अपने आकाओं को खुश करने के लिए ही सही, उनकी पसंदीदा स्वरलहरी सूनाता है. बिहार में तो असली नतीजे आ जाने पर भी एक्जिट पोल के नतीजे सुना डाले थे. वैसे इस तरह के पोल के नतीजों की खासियत यह रहती है कि ओपिनयन पोल में जो जीत रहा होता है वो पूरे विश्वास के साथ बताता है कि हम क्या बोलें, आप खुद ही देख लिजिये ओपिनियन पोल के नतीजे..यही जनता की मंशा है और जिसे ओपिनियन पोल हारा दिखा रहे होते हैं वो कल नतीजे आने तक रुकने की बात कहते हुए हमारी अम्मा के मुहावरे का पूर्ण भक्ति भाव से मुस्कराते हुए उच्चारण करता है: नाऊ भाई नाऊ भाई कितने बाल.. सरकार दो घड़ी में आगे ही गिरेंगे... वह एकाएक मंझा हुआ चुनावी विश्लेषक बन जाता है और मय माह और तारीख के पुराने २० सालों के उन सारे ओपिनियन पोलों का ब्यौरा सामने रखने लग जाता है जिसमे ओपिनियन पोल उन्हें हारा दिखा रहे थे और बाद में असली नतीजों में वह जीत गए थे. तारीफी यह कि ब्यौरा देते वक्त वो उन चुनावों को गायब कर जाता है जिसमें ओपिनियन पोल सही साबित हुए थे. ओपिनियन और एक्जिट पोल के नतीज़ों पर यह बात भ्रष्टाचार की तरह ही दलगत राजनीत से ऊपर की है और सभी दल इसका अक्षरशः पालन करते हैं. दो घड़ी में असली नतीजे आ ही जाते है. जीते हुए सूरमाओं की जीत की ख़ुशी में बजते ढोल की आवाज में ओपिनियन पोल की आवाज गोल हो जाती है. .. इसके बाद बस टीआरपी का जरिया बदल जाता है – नई सरकार और नया विपक्ष जो आ जाता है. -समीर लाल ‘समीर’

शुक्रवार, 13 जून 2014

कौन........

कौन रुसवाइयों के लिए ठहरता है ‘बवाल’ ?

मौत के वास्ते, दीदार से ही काम निकाल !! 


---बवाल

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

काव्य रसज्ञ पं. भवानी प्रसाद तिवारी चचा लुक़्मान की दृष्टि में


(पद्दमश्री स्व. पं भवानी प्रसाद तिवारी के सौवें जन्म दिवस पर विशेष)


दर्द उनका, अश्क बनकर, वाँ गिरा वो काँ मिला ?
ढूंढते तो सब रहे पर, आख़िर हमको याँ मिला !

अपने इस शेर को हम, इस लेख के उनवान की नज़्र कर रहे हैं क्योंकि, इस शीर्षक और इसके तले कुछ लिखने का मौक़ा मिलने से बेहतर आशीर्वाद हमारे लिए और हो भी क्या सकता है भला ? अहा ! ‘उस्ताद के उस्ताद पर उस्ताद का नज़रिया’ ! क्या कहना ! और इसके लिए हमारा इंतिख़ाब भी काफ़ी सोच समझ कर किया गया लगता है। भई, वजह भी तो ज़ाहिर है। अरे, जब तक हम ‘काव्य’ को समझ पाने की वय पाते, तब तक ‘रसज्ञ’ तो दुनिया को अपनी ‘माटी की गागरिया’ में ‘रस भरी सागरिया’ सौंप कर महाप्रयाण कर चुके थे।

नाना प्रकार और नाना

और नहीं तो क्या ? अब दुनिया जानती रही होगी उनको, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कविवर, गीतकार, पत्रकार, ‘काव्य रसज्ञ’, पूर्व महापौर, पूर्व राज्य सभा सांसद, नगर प्रहरी, पद्मश्री पंडित भवानी प्रसाद तिवारी, पंडित जी, पापाजी जैसे नाना प्रकार के नामों से और रूपों में। मगर हम तो बस इतना ही जानते थे कि, आप हमारे और नानाओं (किशोर कुटी वाले डॉ. सी. के. तिवारी एवं बंधु) जैसे ही एक ‘नानाजी’ थे। कभी-कभी जब हमारे घरों की गौवें इनके बंगले-बाड़ी में घुस जाती थीं और हम अपनी छोटी सी साइकिल पर लठिया-गिरमा लिए उन्हें लिवाने इनके कने पहुँच जावें, तो आप बनावटी गुस्सा दिखलाते हुए अपनी जादुई छड़ी से गौवों को बड़े प्यार से हमारी तरफ़ हकालते हुए कहें कि, “ए डाक्टर के नाती, अबकी दफ़े तेरी गैया आई, तो हम सब दूध यहीं दुह लेंगे, फिर तू क्या पिएगा बोल”? और फिर ठहाका मारकर हँस देवें और हम भाग छूटें। या कभी-कभी इतवार को जब हम दादा रघुनाथ नाई की दूकान पर कुर्सी के हत्थों पर रखे पटिये पर बैठे बाल कटाते हों और आप कहीं पहुँच जावें, तो नाई की कैंची की कच-कच-कच-कच के बीच कहें-“हाँ भाई रघुनाथ, जरा इस छोटू के थोड़े थोड़े कान भी काट ल‍ईयो, बहुत बड़े बड़े हो गए हैं, यार”। और जब हम जवाब में “आँ sss” करें तो कहें कि, “चल अच्छा, कान नहीं तेरी गैया की दुम काट लेंगे बस, हा हा”। तब भी वही हो याने कि “आँ sss” । इसके आगे के भवानी को हम क्या जानते थे तब भला ?  हाँ, जिन्होंने बतलाया वो थे, हमारे शहज़ादे मियाँ सारंग के “माती की गागलिया वाले नानाजी”, याने...... 

वाह ! भाई लुकमान
   
स‍न्‌ १९७२-७५ का ज़माना रहा होगा शायद। हम भी क्या, तब बालिश्त भर के ही रहे होंगे। धुरेड़ी के दिन, रंग-पिचकारियों के संग, साथियों की हुड़दंग से निपट-थक-सोकर के थोड़ी शाम-थोड़ी रात को जागे ही थे कि कोई बाहर बुलौवा दे गया। “कक्काजी, पंडितजी के इते लुकमान की कब्बाली है, सुनबे आ ज‍ईयो।” सो भोजनोपरांत नानाओं (तिवारी बंधु) और मामाओं के संग अपन भी लटक लिए। 
अहा! क्या ढोलक-बाजा-गाना और तालियाँ सज रहीं थीं वहाँ! वाह वाह! अब हमें वह काव्य-गीत-क़व्वाली तो क्या ही समझ आती पर हरेक रचना के बाद, जब भवानी नाना अपने माथे पर पड़ी बालों की लटों को गर्दन के झटके से पीछे करते हुए दाद दें कि, “वाह भाई लुकमान,” और चचा हौले से मुस्करा कर दाद स्वीकार करें तो न जाने क्यों हमको भी बड़ा मज़ा आता था। अदब को बासलीक़ा पेश करने, उसकी तारीफ़ करने और पाने का वैसा अंदाज़, हमने तमाम उम्र कभी भी और कहीं भी नहीं देखा।

आला दर्जे के साहित्य और रूहानी सूफ़ियाना संगीत के रंगों से सराबोर, उस सुहानी महफ़िल की एक अमिट याद, हमारे दिल में बस कर रह गई। चचा लुक़्मान की कर्णप्रिय आवाज़, ये बोल “माटी की गागरिया”, “हाल गुज़रगाहे वफ़ा का देखा” और गुलशेर मियाँ की शानदार ढोलक की वो गमक। बस, इसके आगे बहुत लम्बा अरसा गुज़र गया।

बिटिया ने मिलाया चचा लुक़्मान से 
सन् १९९५ में जब हमारी बिटिया सिद्धीबाला के बारसे का आयोजन होना था तो न जाने क्यों और कहाँ से ज़ेहन में ‘माटी की गागरिया’ की भूली बिसरी याद आ गई और चचा लुक़्मान को सुनने की तड़प जाग उठी। अम्माजी (श्रीमती नंदिनी दुबे, एड्वोकेट) बोलीं, “तुम्हारी पहली सालगिरह पर बहुत बड़ी महफ़िल हुई थी उनकी। तब शहर भर के गणमान्य और प्रबुद्ध नागरिक आए थे। तमाम मैदान भर गया था और सामने की सड़क तक जाम हो गई थी। क्या पता अब वो हैं भी के नहीं, बहुत बरसों से उनके विषय में सुना भी तो नहीं।” 
ख़ैर, जब दिल ना माना तो मोहल्ले-मोहल्ले बगैर गूगल के ही, सर्च करते हुए गोहलपुर की अलिफ़-बे मस्जिद के पीछे से खोज ही लाए हम चचा लुक़्मान को। अहा! क्या महफ़िल हुई फिर ! लाजवाब ! 
बरसों की प्यास को स्वाति की बूँद थी वह, वह महफ़िल। 

पंडितजी और चचा लुक़्मान की निस्बत 
हफ़्ते भर बाद ही चचा न जाने क्या सोचकर हमारे पास आए और कहा - “अपनी तो चला-चली की बेला है, ले लो जो कुछ लेना हो भाई।” हम तो तत्काल विधिवत उनके शागिर्द बन गए। सीखने सिखाने के दौर में जब चचा से बातें हों और वे यादों में खो जाएँ, तो पंडितजी का नाम आते ही उनकी आँखें नम हो जाती थीं। हमेशा कहते थे, “पंडितजी चले गए, बस महफ़िल उठ गई यार।” चचा के दिल से पंडितजी के लिए बस कुछ इसी तरह निकलता था-

गीत अधूरे, तुम बिन मेरे, साज़ों में कोई तार नहीं
बिखरी हैं रचनाएँ सारी, शब्दों में कोई सार नहीं

एक दिन रियाज़ करते वक्‍त “प्यार ना बाँधा जाए” गाते गाते अचानक कह उठे,

“दौरे-क़ाबे की ज़ियारत तो फ़क़त हीला है
जुस्तजू तेरी लिए फिरती है घर घर मुझको।” --- जलील

कुछ देर ख़ामोश रहकर हमने उनसे कहा कि चचा हमें कुछ और बतलाइए ना पंडितजी के बारे में। उनकी नज़रें कह उठीं-

चलो मिलाते हैं तुमको उनसे, यहीं कहीं है पड़ाव उनका
औ’ जब मिलोगे तो देख लेना, है हमसे कितना जुड़ाव उनका 

--- ‘बवाल’

पंडित भवानी की कहानी - चचा लुक़्मान की ज़ुबानी 
चचा ने आगे फ़रमाया- “सन् ५२ के आसपास की बात है, गनेशों के दिन थे। जी! गढ़ा में एक वक़ील साहब हुआ करते थे, वहाब। उन्होंने मुझसे कहा- चलते हो पंडितजी कने? मैंने कहा- मैं तो नहीं जानता कौन पंडितजी हैं? कहने लगे- मेयर हैं यार चले चलो। मैंने कहा- क्या करेंगे हम वहाँ जाके यार? कहने लगे- नहीं नहीं चलो तो, बड़े शौकीन लोग हैं। मैंने कहा हमारे जैसे शौकीन हों तो ठीक है वरना शास्त्रीय संगीत तो मैं जानता नहीं। ख़ैर, जब पंडितजी के यहाँ पहली ग़ज़ल, ‘तू बेहिजाब है आईना तुझको तकता है, संभल संभल ये सितम कौन देख सकता है’ गाई, तो बहुत पसंद की गई। याने हद से ज़्यादा पसंद की गई। सुरेन्द्रनाथ शुक्ला जी वगैरह बड़े बड़े लोग बैठे हुए थे। यहाँ ग़ज़ल ख़त्म हुई और पंडितजी जी, जो कहीं बाहर गए हुए थे, ठीक तभी आए। कहा- नहीं नहीं भाई, फिर से शुरू हो। फिर से ग़ज़ल हुई। मैंने उन्हें देखा। बड़े पुरख़ुलूस शख़्स नज़र आए। क्या कहना ! पंडितजी ने सुनने के बाद कहा- भाई, अब इसके ऊपर ही चलना है, नीचे नहीं जाना है। उस हौसले ने मुझे काफ़ी बुलंद कर दिया। 
इतने लोगों से मिला जीवन में मैं बवाल। (हमारा यह तख़ल्लुस चचा लुक़्मान का ही दिया हुआ है) सब एक से बढ़कर एक अदीब। मगर पंडितजी पंडितजी ही थे। ‘एक सम्पूर्ण जाग्रत साहित्य, ओज में मौन का शिष्ट मिश्रण। स्नेह में भी साधना, ऋण में उऋण, आरोह में समारोह, चैन में नैन और नैन में बैन, प्यार में ज्वार और ज्वार में बयार, हर वय में लय, चँचलता में सुधि, अनगिनगुन वैविध्य का कोषागार, प्राण पूजन की निरापद धारा, निज़ाम का निबाह, तम्कीन का तर्जुमा, अदबआरा, रम्ज़ आगाह और दल्क़पोश शाह।’ क्या क्या नहीं किया यार उन्होंने हमारे लिए। ज़िंदगी तेर कर दी। लाईब्रेरी की नौकरी लगवाई, जीवन भर के लिए जुगाड़ कर गए। नामालूम कितने प्रोग्राम करवाए। उषा-भार्गव कांड के समय जान हथेली पर रखकर हमारी ख़ैर ख़बर लेते रहे। हमारे टूटे हुए मन को उन्होंने हमेशा संभाला वरना अपनी बिसात क्या। पड़े रहते एक कोने में कहीं।” 

चलते चलते

हम दोनों की डबडबाई आँखें एक दूजे से बस इतना ही कह पाईं फिर-

तुमने मेरी आम नज़र से, ख़ास भला क्या क्या देखा ?
अँधेरे की थाह से उभरा, बिसरा उजियारा देखा ! 



मंगलवार, 9 अगस्त 2011

सावन झमाझम उमंग मेरा झूलना



सावन झमाझम, उमंग मेरा झूलना
हरियाली सखियाँ, सतरंग मेरा झूलना

पहला झूला-झूला मैनें बाबुल के राज में,
मैया की लोरी के संग मेरा झूलना

दूजा झूला-झूला मैनें भैया के राज में,
भौजी के रंगों में भंग मेरा झूलना

तीजा झूला-    झूला, ससुर जी के राज में,
सासू माँ का ढम ढम, मृदंग मेरा झूलना

 सबसे प्यारा झूला-झूला सैंया के राज में,
रस की फुहारें, तरंग मेरा झूलना

---बवाल

सोमवार, 18 जुलाई 2011

हुस्ने-क़ुद्रत

मैं हुस्ने-क़ुद्रत बयाँ करूँ क्या ?

असर में होशो-हवास खोया !

नज़ारे जन्नत के इस ज़मीं पर,

सभी हैं मेरे ही पास गोया !!

--- बवाल





मंगलवार, 10 मई 2011

मातृ दिवस पर भी देर से.......


ढूँढता रब को फिरा हूँ, इस जहाँ से उस जहाँ
भूल बैठा था कि रब का, रुप ही होती है माँ!

आदतन इस बात को भी, देर से जाना है मैने!

-समीर लाल ’समीर’

गुरुवार, 5 मई 2011

मुझसे मूँह मोड़ा नहीं होता.....




बाबू जी ने गर इतनी जायदाद को छोड़ा नहीं होता
मेरे अपने भाई ने कभी,मुझसे मूँह मोड़ा नहीं होता..

जोड़ दे जो मकान में आई ऐसी दरारें भी सीमेन्ट से....
ढूँढता हूँ मैं बेकरार हो, आज ऐसे किसी ठेकेदार को!!!


-समीर लाल ’समीर’

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

कटाक्षे-आज़म डॉ. कुमार विश्वास (जी) के जबलपुर में कार्यक्रम पर उनके ब्रैकेट में सम्मान में...........

बे‍अदबज़बानी, लम्पटता के क़ब्ज़े में ही आलम था

वो साबुत लौट के इसकर गए, के सब्र हमारा क़ाइम था

--- बवाल

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

मौत का टुम्मा (रसीद)

मौत ने तारीख़ तय कर,  उसपे टुम्मा कर दिया

हमने भी इसकर के फ़ौरन, मय पे चुम्मा कर दिया

----बवाल

टुम्मा  =  रसीद 
मय  =  शराब या भक्तिरस, आप जो भी मान लें

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सम्मान समारोह, जबलपुर

चार मित्रों राजेश पाठक,गिरीश बिल्लोरे,बसंत मिश्रा,डा०विजय तिवारी किसलय, ने विगत तेरह वर्ष पूर्व एक कल्पना की थी. वो यह कि हम स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त मधुकर जी स्मृति में उनके समकालीन व्यक्तित्वों को सादर आमंत्रित कर उनसे सीमित-साधनों के दौर में होने वाली सफ़ल एवम सुफ़ल साहित्य-साधना एवम पत्रकारिता के अनकहे बिन्दुओं से परिचित होंगे और बस एक कार्यक्रम की कल्पना को आकार दिया मधुकर जी के के जन्म दिवस पर “ स्वर्गीय हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह ”के रूप में “और अगले ही वर्ष से शुरु हो गया यह सिलसिला.

बस विनम्र भाव से अपनी बुजुर्ग पीढ़ी से आशीर्वाद लेते ये युवा प्रति वर्ष स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त मधुकर जी के समकालीन बुजुर्ग पत्रकार को तथा एक युवा विचारवान सृजन धर्मी पत्रकार को सम्मानित करने लगे. उनसे समझने लगे सीमित साधनों में असीमित सफ़लता के रहस्य .

इसी क्रम में 2008 से अंतरज़ाल के ज़रिये लेखन करने वाले लेखकों की तलाश की गई. जबलपुर के श्रेष्ठ ब्लागर के रूप में 2009 श्री महेंद्र मिश्रा को सम्मानित किया.

श्रेष्ठ ब्लागर के रूप में इस वर्ष 2010 को उड़नतश्तरी यानि समीरलाल को सम्मानित किया जा रहा है.
सतत जारी वैचारिक कार्यक्रम

स्वर्गीय हीरालाल गुप्त स्मृति सम्मान

श्री महेश महेदेल

वरिष्ठ पत्रकार ,स्वतंत्र-मत,जबलपुर
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सव्यसाची प्रमिला देवी बिल्लोरे स्मृति सम्मान 2010

ओम कोहली ,संपादक ,डीज़ि-केबल, जबलपुर
___________________

लिमटि खरे,पत्रकार नई दिल्ली
कृष्ण कुमार खरे ,वरिष्ठ पत्रकार,जबलपुर

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हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लागर : समीरलाल,कनाडा ,
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विमोचन :-

श्री सतीश शर्मा की कृति “दिखावा खत्म : मंहगाई खत्म ” का

सतीश शर्मा जी

कार्यक्रम स्थल एवम समय :-

भातखण्डे संगीत महाविद्यालय, मदन महल स्टेशन के पास , जबलपुर मध्यप्रदेश
शुक्रवार 24 दिसम्बर 2010 समय शाम 06:30 बजे से

रविवार, 28 नवंबर 2010

सौवां धमाल: लाल और बवाल

एक अंतराल के बाद जबलपुर पहुँच फिर जमी महफ़िल लाल और बवाल की और यह दौर यूँ ही चलता रहेगा रुबरु जब तक जबलपुर प्रवास जारी है.



कल कुछ मजेदार एवं यादगार समय बीता लाल और बवाल का गिरीश बिल्लोरे जी और सलिल समाधिया जी के साथ, जिसे रिकार्ड कर एक नये प्रयोग की शुरुवात हुई. यह मिलन ऑन लाईन लाईव ब्रॉडकास्ट किया गया भाई बिल्लोरे जी द्वारा:




फिर बैठे लाल और बवाल अपने पुराने चिरपरिचित डेरे पर. कुछ जुगल बंदियों का दौर चला, कुछ बीती बातें..जाने कितनी रात तक महफिल चलती रही. बवाल गाता रहा, लाल सुनाता रहा. बवाल ने गाया एक मुखड़ा लाल के लिखे गीत का. गाया तो और भी बहुत कुछ, मगर अभी रिकार्डिंग सिर्फ मुखड़े की उपलब्ध है, बाकी तो रोज होती ही रहेगी.

गीत पढ़िये और फिर बवाल से मुखड़ा सुनिये:

बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो !!


टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया !
कोई बहर-वहर की बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया !!
------परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया !!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !


ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं !
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं !!
------धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं !!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !


आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है !
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है !!
------हृदयों को जिसने जीत लिया,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है लफ़्ज़ों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो !

-समीर लाल ’समीर’




और इस तरह इस पोस्ट के साथ आज पूरा हुआ १००वीं पोस्ट का सिलसिला जो अनवरत जारी रहेगा.

आप सबके स्नेह का लाल और बवाल की तरफ से बहुत बहुत आभार.

रविवार, 16 मई 2010

जाने क्या वो लिख चले.....................(बवाल)

जाने क्या वो लिख चले और, जाने क्या ये पढ़ चले ...?

हम-क़लम के हर्फ़े-आख़िर, दिल में पुरदम गड़ चले............

--- बवाल


हम-क़लम  = एक जैसा और एक साथ लिखने वाले, मित्र (...., ....., .....)

हर्फ़े-आख़िर = अटल और अंतिम निर्णय, शब्द या बात व्यक्त करते हुए वर्णाक्षर

पुरदम = भर-ताक़त

सोमवार, 1 मार्च 2010

किसिम किसिम की गुलाल................................

किसिम-किसिम की गुलाल लेकर,  हम उड़ चले थे उन्हें लगाने  !




मगर वहाँ से वो उड़ चले थे, तमाम रंगत को ही मिटाने !!



तभी  यकायक से मौसमे-गुल, ने हक़ में अपने जो दी गवाही !



तो हैरत-अँगेज़ रँगे-जन्नत, लगे हमारी ग़ज़ल सजाने !!





आप सभी साहिबान को ईद, होली और हॉकी में हिन्दोस्ताँ की बेहतरीन जीत पर ढेर सारी बधाइयाँ

--- बवाल

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

माटी की गागरिया................(बवाल)


दुपहरिया बीत चली,

पनघट पर रीत चली !

पनिहारिन फिर लौटी,

भर रस की सागरिया !

माटी की गागरिया !!


--- पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी

!!  हमारे उस्ताद लुक़्मान जी के भी उस्ताद और संस्कारधानी के प्रथम महापौर पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी की पुण्य जयंती १२ जनवरी पर उन्हें

शत् - शत् श्रद्धा-सुमन !!

और

!! आप सबको महाशिवरात्रि पर्व पर ढेर सारी शुभकामनाएँ !!


कचनार सिटी जबलपुर के ७६ फ़ीट ऊँचे शिवजी


भोला नई माने रे नई माने, मचल गए भंगिया (भाँग) पै

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मैं जनाज़ा हो चला.............................(बवाल)

दोस्त तेरी महफ़िलों से, जी मेरा,   ले भर गया

मैं जनाज़ा हो चला, ऐलान कर दे,   मर गया



काश, दिल का दर्द तू, पहले बता देता कभी !

क्या मैं तेरे सामने, ज़िंदा नहीं होता अभी  ??

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

चचा लुक़्मान ज़िंदाबाद : बवाल का सलाम

कुछ ऐसी तसव्वुर की, महफ़िल सजाएँ

जहाँ हों वहीं से, उन्हें खैंच लाएँ 

क़व्वाले-आज़म तहज़ीबिस्तान

चचा लुक़्मान



हमारे उस्ताद की जयंती

१४ जनवरी १९२५ (मकर संक्राति) पर

उन्हें ‍शत् शत् नमन

(महाप्रयाण :- २७ जुलाई २००२)

पद्मश्री पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जी की इन पंक्तियों के साथ

मधुर बीन तेरी स्वरित तार मेरे

बहुत जोड़ता हूँ, नहीं जोड़ पाता

और

हमारे श्रद्धासुमन


चोटों पे चोट खाना, खाकर वो भूल जाना

मुझे मुआफ़ करते करते, अल्लाह बन न जाना


एहले ज़बाँ का मुझको, वो इल्म ना हो शायद

तेरी कहन को लेकिन, हूँ जानता निभाना

---बवाल

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

अलसेट में हो गया लेट : नतीजा बवाल की रीमिक्स पहेली २००९ का

आदरणीय एवं प्रिय आत्मीयजनों,
साल २००९ की और बवाल की अब तक की इकलौती “रीमिक्स" पहेली के नतीजे की घोषणा करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। हालाँकि यह अपने निर्धारित समय से कई दिन बाद हो पा रही है क्योंकि इसके आयोजक पिछले दिनों ज़रा अलसेट में पड़े हुए थे, और इसीलिए देर के लिए हम आप सब के क्षमाप्रार्थी हैं। अलसेट का तो ऐसा है कि जब जब वो हमें होती है तो अपने साथ साथ हम अपने कुछ प्रियजनों की भी अलसेट करवा देते हैं ताकि उनका हमारा साथ बना रहे। हा हा। देखिए ना पिछले दस-पाँच दिनों में हमारे कितने ही प्रियजनों की अलसेट होती रही। हत्ता कि भैं-भैं रू-रू झटक-पटक तक हुई । मगर हम सदैव उनका साथ देते आए हैं और देते रहेंगे।

खै़र चलिए आगे चलते हैं।
जी हाँ, तो पहेली के जज, बिगब्रदर समीर-लाल जी ने सभी जवाबों का महीनता से अवलोकन करके पहेली का नतीजा घोषित कर दिया है।


हमारे साथ ज़ोरदार तालियों से जीतने वालों का स्वागत कीजिए
जी हाँ तो लीजिए इस रीमिक्स पहेली के

विजेता हैं :

हम सब के प्रिय स्मार्ट इण्डियन जी




इन्होंने पहेली कुछ इस अंदाज़ में बूझी :-

बवाल जी,
पहला इनाम तो गया पहली टिप्पणी में मगर दुसरे का दावा तो किया जा सकता है. यह तो सीमा जी की प्रसिद्ध रचना है. आपके सारे प्रश्नों के जवाब यहाँ पर हैं:
http://mairebhavnayen.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html

अरे भैया, ऐसे तो हम हर परीक्षा पास कर लेते परीक्षा लेने वाले से यह कहकर, कि आपके इन सारे प्रश्‍नों का जवाब हमारे निसाब (कोर्स) की फ़लाँ फ़लाँ पुस्तक में हैं। हा हा। मगर फिर भी आपने यह ज़हमत उठाई और सही जगह पहुँचे इसीलिए ख़िताब हुआ आपके नाम।


प्रजेता हैं:

परम आदरणीया सुश्री सीमा गुप्ता जी




इन्होंने पहेली कुछ इस अंदाज़ में बूझी :-
ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ah ah ah ha ha ha ha .................ha ha ha ha ha ha ha


उनका मतलब यह था कि आप हँसिए मत, बड़ी कठिन पहेली है। उत्तर जो कि मालूम है मगर यदि देती हूँ तो लोग कहेंगे-- आँ ssss ख़ुद का गीत तो कोई भी पहचान जाता। यदि नहीं देती हूँ तो लोग कहेंगे ख़ुद का गीत ही भूल गए। हा हा।


वे विशाल हृदय हैं, इसीलिए बवाल से नाराज़ भी नहीं हुईं कि उनका  इतना सुन्दर गीत क्यों इस तरह तोड़ा-मरोड़ा ?
इसीलिए हमारी जुगलबंदी उनका तहेदिल से आभार प्रकट करती है कि उन्होंने पहेली की रोचकता बनाए रखने में हमें सहयोग दिया।
Rewards

और हमारे हृदय-विजेता हैं सर्वादरणीय-सर्वश्री :-
शशिकांत ओझा जी
समयचक्र वाले महेंद्र मिश्रा जी
राज सिंह जी
दिनेशराय द्विवेदी जी
नीरज गोस्वामी जी
राज भाटिया जी
समीर लाल जी
निर्मला कपिला जी
बेनामी जी
ताऊ रामपुरिया जी
अनूप शुक्ल (फ़ुरसतिया जी)
सुश्री अल्पना वर्मा जी
ज़ाकिर अली रजनीश जी
गिरीश बिल्लोरे ‘मुकुल’ जी
डॉ. मनोज मिश्र जी
मुरारी पारीक जी
अरविंद मिश्रा जी
ललित शर्मा जी
निर्झर’नीर जी
किसलय जी

और ये हैं रीमिक्स पहेली के सही जवाब :-


१) किस ब्लॉगर ने लिखी ?
          सुश्री सीमा गुप्ता


२) किस ब्लॉग पर लिखी ?
      http://mairebhavnayen.blogspot.com/2008/12/blog-post_06.html


३) किस तारीख को लिखी ?
      ६ दिसंबर २००८


४) रचना की पहली लाइन क्या है ?
        हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,


और पूरा ख़ूबसूरत गीत यह है :

हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,
साजों मे भी अब तार नही..
बिखरी हुई रचनाएँ हैं सारी,
शब्दों मे भी वो सार नही...
जज्बातों का उल्लेख करूं क्या ,
भावों मे मिलता करार नही...
तुम अनजानी अभिलाषा मेरी,
क्यूँ सुनते मेरी पुकार नही ...
हर राह पे जैसे पदचाप तुम्हारी ,
रोकूँ कैसे अधिकार नही ...
तर्ष्णा प्यासी एक नज़र को तेरी,
मिलने के मगर आसार नही.....


***

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

साल २००९ की "रीमिक्स" पहेली : आयोजक बवाल

ये पहेली - वो पहेली, फ़लाँ पहेली - ढिकाँ पहेली, यहाँ पहेली - वहाँ पहेली, आऊ पहेली - म्याऊँ पहेली - उबाऊ पहेली, उड़न पहेली - गिरन पहेली, पूछ पहेली - ताछ पहेली, राज़ पहेली -  फ़ाश पहेली,  इफ़ पहेली - बट पहेली, पहेली - पहेली, अहेली - अहेली, हेली हेली -  एली एली, ली ली - ई ई, ईईईईईईईईईईई.............................................ई ।
बस, बस, बस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स......।

सुनते सुनते, पढ़ते पढ़ते, भाग लेते लेते, इतनी गड्डम-गड्ड मच गई है कि अब तो हमें भी पहेली पूछने का मन होने लग गया रे भैया। अब तो हम भी पूछेंगे । नई तो पूँछ खैंचेंगे । हा हा।

बस इसी चक्कर में सोचा क्यों ना वो वाली चित्र पहेली पूछी जाए जिसमें दो एक से चित्र बना कर दूसरे वाले में कुछ ग़लतियाँ कर दी जाती हैं और फिर दोनों में अन्तर पूछा जाता है। मगर अलसेट यह हो रही थी कि चित्र अपन से बनते कहाँ हैं ? ख़ुद ही विचित्र जो ठहरे। या जैसे कभी कभी किसी की अच्छी भली तस्वीर को सिल बट्टे पर पिसी हुई अमरूद की चटनी बना कर पूछा जाता है, पईचान कोन ?  पर बचपन में एक दफ़ा दोनों पैर के अँगूठों पर इसी चक्कर में सिल गिरा बैठे थे सो ये आइडिया तत्काल प्रभाव से ड्रॉप कर दिया। इसकी नाक उसकी उसकी नाक पर लगाना तो सबसे रिस्की है। अरे कहीं किसी ऊँची नाक वाले पर नीची नाक लगा दी तो वो तो हम पर मानहानि का मुकद्दमा ही ठोंक डालेगा ना। ना बाबा ना। तौबा तौबा।  खै़र, सोचते रहे सोचते रहे।

अचानक एक विचार कौंधा और हमने आनन-फ़ानन में एक मशहूर ब्लॉगर की एक बहुत ही बेहतरीन रचना चूज (चूज़) की और उसे रीमिक्स (तोड़-मरोड़) बनाने की ठान ली। मगर तुर्रा ये के गीत लिखना अलग बात उसे तोड़ना मरोड़ना, डिफ़रेण्ट। अलग और डिफ़रेण्ट में क्या डिफ़रेन्स है ये तो आप लोग जान ही चुके हैं। है ना ?  मगर ज़रूरत पड़ने पर आदमी फ़िल इन द ब्लैंक्स को भी अपना फ़िल इन द बलैंक्स बना लेता है, आपको विश्‍वास न हो तो चाहे जिससे पूछ लें। हमने भी यही किया और अपने भीतर के बवाल को अपना फ़िल इन द ब्लैंक्स बना कर यह काम सौंप दिया। मगर ससुरा यह बवाल है ना, ये अपने नाम को पहले दिन से ही बट्टा लगाए बैठा है। नाम बवाल है और काम हमेशा उल्टा ही करता है। देखिए ना हमने रचना को तोड़-मरोड़ कर रीमिक्स (जैसा कि आजकल लता जी, आशा जी, किशोर दा, रफ़ी साहब आदि के सदा बहार सुन्दर गानों की बखिया उधेड़ कर किया जा रहा है) बनाने को कहा और उसने ओरीज़नल सुन्दर रचना के शब्दों को न जाने किस तरह उलट पलट कर एक दूसरे ही रूप में सामने रख दिया । अब हम करते भी तो क्या करते जब शब्द भी वही, सेन्ट्रल आइडिया भी वही और बात भी वही तो मान लिया रचना को "रीमिक्स"। हा हा ।

बहरहाल अब आपको इस रीमिक्स पहेली को कुछ यों बूझना है के नीचे दी गई “रीमिक्स” रचना की ओरीज़नल रचना :-

१) किस ब्लॉगर ने लिखी ?

२) किस ब्लॉग पर लिखी ?

३) किस तारीख को लिखी ?

४) रचना की पहली लाइन क्या है ?

तो लीजिए पढ़िए ये रीमिक्स रचना और बूझिए पहेली :-


गीत अधूरे तुम बिन मेरे

***

गीत अधूरे, तुम बिन मेरे, साज़ों में कोई तार नहीं !

बिखरी हैं रचनाएँ सारी, शब्दों में कोई सार नहीं !!


भाव हृदय के व्यक्त करूँ क्या ? अन्यमनस्का हूँ मैं अब तो !

बस जज़्बात मचलते रहते, मिलता कहीं करार नहीं !!


तुम अनजानी अभिलाषा हो, या मृगतृष्णा मेरी हो तुम !

झलक दिखाते, नज़र ना आते, सुनते मेरी पुकार नहीं !!


तप्‍ते मन की, बिरहा अगन पर, प्रेम फुहारें बरसा दो अब !

ऐसा मत कह देना के फिर, मिलने के आसार नहीं !!


कम से कम मेरे अन्त से पहले, प्रियतम मिलने को आ जाना !

ये मेरी मनुहार है तुमसे, ये मेरा अधिकार नहीं !!


--- बवाल (रीमिक्सर)


***

नोट : रीमिक्स पहेली का उत्तर एवं विजेता का नाम ३१ दिसम्बर २००९ से १ जनवरी २०१० के बीच  प्रकाशित कर ही दिया जावेगा। (नहीं तो लोग क्या कहेंगे) हा हा !