शेर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शेर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 5 मई 2011

मुझसे मूँह मोड़ा नहीं होता.....




बाबू जी ने गर इतनी जायदाद को छोड़ा नहीं होता
मेरे अपने भाई ने कभी,मुझसे मूँह मोड़ा नहीं होता..

जोड़ दे जो मकान में आई ऐसी दरारें भी सीमेन्ट से....
ढूँढता हूँ मैं बेकरार हो, आज ऐसे किसी ठेकेदार को!!!


-समीर लाल ’समीर’

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मैं जनाज़ा हो चला.............................(बवाल)

दोस्त तेरी महफ़िलों से, जी मेरा,   ले भर गया

मैं जनाज़ा हो चला, ऐलान कर दे,   मर गया



काश, दिल का दर्द तू, पहले बता देता कभी !

क्या मैं तेरे सामने, ज़िंदा नहीं होता अभी  ??

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

दिल में .............(बवाल)

वाह, क्या दीवान तेरा, नूर सा फबता हुआ !



जिसमें ख़ुद को पा रहा हूँ, तुझसे मैं कटता हुआ !!



ख़ैर दिल की बात दिल तक ही, रखूंगा यार अब !



और कर भी क्या सकूंगा, मोहरा हूँ पिटता हुआ !!



--- बवाल

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

सबब ................(बवाल)

मैं सब्रो-रंगे-सुकून में हूँ , मुझे संभालो मेरे सहारों

सबब है इस इल्तिजा के पीछे, के चल बसा हूँ ओ मेरे यारों

---बवाल

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

ख़ुद ही पड़ा ........................(बवाल)

क़ातिल अदा का तेरा, क्या ख़ूब था निभाना !
मैं फ़ौत हूँ ये मुझको, ख़ुद ही पड़ा बताना !!

---बवाल
फ़ौत = मृत

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

अलग रही है.............(बवाल)

जो बख़्ते-खुफ़्त: सी लग रही है,
वो रफ़्त: रफ़्त: सुलग रही है !
मेरी कहानी ज़माने वालों,
अज़ल से ही कुछ अलग रही है !!
---बवाल
बख़्ते-खुफ़्त: = सोया हुआ भाग्य
रफ़्त: रफ़्त: = आहिस्ता आहिस्ता
अज़ल = अनादिकाल

मंगलवार, 31 मार्च 2009

आता है रफ़्त: रफ़्त: ......................(बवाल)

मकीं जो होते हैं आ के दिल में, उन्हीं से होता है दिल-शिकस्त:
ये वो हक़ीक़त है जिसपे सबको, यक़ीन आता है रफ़्त: रफ़्त:
मकीं = रहने वाले , शिकस्त: = टूटता

रविवार, 22 मार्च 2009

वो खू़न बाक़ी बचा कहाँ अब ? ............(बवाल)

वो ख़ून बाक़ी बचा कहाँ अब ? जो इन रगों में बहा किया था
हमीं ने शायद बफ़ज़्ले-साक़ी, बवाल इनमें रवाँ दिया था
---बवाल
बफ़ज़्ले-साक़ी = पिलाने वाले की मेहरबानी से
बवाल = यहाँ शराब के लिए इस्तेमाल किया गया
रवाँ = प्रवाहित करना

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

पुरवाई में ??.............(बवाल)

नाम उनका पुकारा गया बज़्म में,
थे जो मसरूफ़ अपनी ही तन्हाई में !
लोग ठिठके, ठहर सोचने ये लगे !
किसने तूफ़ाँ को छेड़ा है पुरवाई में ??

सोमवार, 12 जनवरी 2009

सोचेगा क्या ? ? ? --- बवाल

हौवा का मेरे आगे, क्या ख़ूब था बहाना !

आदम हो तुम क्या जानो ? सोचेगा क्या ज़माना !!

---बवाल

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

मिसरा-ए-ऊला .... मिसरा-ए-सानी (नव-वर्ष पर :- बवाल)

ब्लॉगिस्ताँ के सभी अहबाबों और अजीजों को नव-वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ और बधाइयाँ ---

हमारी नज़र में, ये दुनिया-ए-फ़ानी

है मिसरा-ए-ऊला, है मिसरा-ए-सानी

---बवाल

भावार्थ :-
ये नश्वर संसार ज़रूर है, पर नष्ट होता नहीं। यही बीता वर्ष (मिसरा-ए-ऊला) भी है और नव वर्ष (मिसरा-ए-सानी) भी यही कुछ रहना है। न बदला है, न बदलेगा कुछ भी। इसलिए वर्तमान को ही गत और नवागत मानते हुए प्रसन्नचित्त जीवन जिए जाइए।

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

रोज़ा-ए-खा़मोश... (मौन का उपवास)

{सीमाजी की ग़ज़ल की ताज़ीम}

इश्क़ पर ईमान, ले आने को वो पुरजोश था

लोग कहते रह गए 'बवाल,' दल्क़पोश था

दस्तरख़्वाँ पे जिसके, सारा आलम, पेशेनोश था

कूच जन्नत कर गया वो, रोज़ा-ए-ख़ामोश था

---बवाल

लुगत :-
ताज़ीम = आदर
पुरजोश = जोश से भरा हुआ
दल्क़पोश = फ़कीर, सूफ़ी
दस्तरख़्वाँ = खाना खाने के लिए बिछी हुई चादर
पेशेनोश = उपलब्ध
रोज़ा-ए-ख़ामोश = मौन का उपवास (मौनव्रत)

गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

वसीयत-ऐ-गुल.......

अबके बहार आना,
कोई ऐसा गुल खिलाना !

मिरे नाम पर वसीयत,
कर दे उसे ज़माना !!


--- बवाल

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

जुड़ाव उनका .....

चलो मिलाते हैं उनसे तुमको, यहीं कहीं है पड़ाव उनका !


जब मिलोगे तो देख लेना, है हमसे कितना जुड़ाव उनका !!

--- बवाल

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

पैरवी-ऐ-क़त्ल ...........(सन्दर्भ : हाल की दुखद घटनाएँ)

क़त्ल का खुलकर के ऐसे, ज़िक्र क्यूँ करते हैं जी ?

पैरवी वो कर रहे हैं ! फ़िक्र क्यूँ करते हैं जी ??

---बवाल

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

बवाल हुआ .....

दिलों की बज़्म में, हमको बड़ा मलाल हुआ !

वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था के बस, बवाल हुआ !!

---बवाल

सोमवार, 24 नवंबर 2008

क़सीदे.....

आपकी तारीफ़ में, जब हम क़सीदे पढ़ चले !

तालियों के सिलसिले, तड़ तड़ तड़ा तड़ तड़ चले !!

---बवाल

क़सीदे = प्रशंसात्मक -पद्य या गीत

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

सफ़्हए-उल्फ़त ......

जहाँ से तुमको पढ़ा नहीं था,

वहाँ से लिखने को अब चला हूँ !

नहीं...., शिकन ना पड़ेगी मुझ पर,

सफ़्हए-उल्फ़त का सिलसिला हूँ !!

---बवाल

शिकन = सलवट, मोड़-तोड़, फटना
सफ़्हए-उल्फ़त = प्यार के पन्ने

सोमवार, 17 नवंबर 2008

नाज़िल हुआ यहाँ ........

जो शेर आसमान से, नाज़िल हुआ यहाँ !

उनकी ग़ज़ल में जा सजा, कामिल हुआ वहाँ !!

---बवाल

नाज़िल = उतरा
कामिल = सर्वांगपूर्ण, परिपूर्ण, पर्फ़ेक्ट

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

बस भरमाते हैं.......................

मुगा़लता तो आप समझते, हम तो बस भरमाते हैं !

तबस्सुमों के आशिक़ हैं भई, रुक कर सच फ़रमाते हैं !!

---बवाल

मुगा़लता = धोखा, ग़लतफ़हमी
तबस्सुम = मुस्कान (स्माइल)