मंगलवार, 10 जून 2008

महकीं हैं ये फ़ज़ाएँ...

अब तक सलीब पर तो, मिलती रही सज़ाएँ !


पर अब सलीब से ही, महकीं हैं ये फ़ज़ाएँ !!

3 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

अच्छा शेर है। सस्नेह

mahendra mishra ने कहा…

शेर बड़ा जोरदार लगा . बधाई

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन.