क्यूँकर नष्ट किया करते हम, इतने प्यारे बीजों को !!
नैतिकता बस छोड़ पढ़ाते, घुड़दौड़न-लड़ना-तरना !
कम्प्यूटर-इंग्लिश-मोबाइल, ड्राइविंग और सर्फिंग करना !!
बचपन में बचपन मुरझाये, ऐसी जुगत लगाते हम !
अदब-क़ाएदा ताक पे रखकर, ज़िन्दा इन्हें बनाते बम !!
इंतिका़म तहज़ीब भी लेगी, देखना इक दिन नस्लों से !
धोना होगा हाथ हमें भी, खड़ी हुई इन फ़स्लों से !!
लाल करें बव्वाल कभी ना, इतना मर्म तो जाने हम !
बहुत हो चुका, चलो चल पड़ें, पालक-धर्म निभाने हम !!
6 टिप्पणियां:
सही है-खूब उड़ाओ उड़ाने वाली चीजें-जैसे उड़न तश्तरी. बहुत उम्दा लिखा है, वाह!!
बहुत सुंदर प्रस्तुति आपसे टेलिफोनिक बात कर बहुत अच्छा लगा .बहुत जल्द आपसे मुलाकात करूँगा .
धन्यवाद.
महेन्द्र मिश्रा
७२९ त्रिमूर्ति नगर जबलपुर
टेलीफोन 4042819
Zarranavazi ke liye aap sabka bahut shukriya.
apke blog padhe bahut achha likhte hain .badhai
nisandeh, aati sunder !
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