गुरुवार, 12 जून 2008

इक तेरी नज़र का (समीर लालजी की पोस्ट पर टिप्पणी)

श्री समीर लाल जी की २६मई की अदभुत पोस्ट पर टिप्पणी लिखने चला तो रक्षंदा जी की उर्दू के बारे में उनकी शिकायत ज़हन में आ गई । दूर करने चले तो ग़ज़ल आगे बढ़ चली ।
गौ़र कीजियेगा :

वाँ ग़मेयार बाकी़ है, इक तेरी नज़र का !
याँ लालाज़ार बाकी़ है, इक तेरी नज़र का !!

साज़ों पे वार हो चुका पर, बेसदा हैं सब !
वो गुंग-तार बाकी़ है, इक तेरी नज़र का !!


मसला मेरी ग़ज़ल का अभी, पुर-असर नहीं !
अभी अश'आर बाक़ी है, इक तेरी नज़र का !!

बेवज़्न बेहवा हो वफ़ा, उड़ती फ़िर रही !
वज़्ने-वका़र बाक़ी है, इक तेरी नज़र का !!

सब शेर सज चुके हैं ग़ज़ल, लबकुशा हुई !
हाँ इश्तिहार बाकी़ है, इक तेरी नज़र का !!

हम पर बवाल कर रही, है सारी कायनात !

पर ऐतबार बाकी़ है, इक तेरी नज़र का !!

(ग़मेयार-महबूब के न मिलने का ग़म), (लालाज़ार- लाल फूलों का बागी़चा), (बेसदा - बेआवाज़), (गुंग-तार -- न बोलने वाला तार), (वज़्ने-वका़र - मान मर्यादा का भार) , (लबकुशा - बोलना )

6 टिप्‍पणियां:

nadeem ने कहा…

भाई वाह!!!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत खूब जनाब...
नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही. उर्दु सीख रहा हूँ अब. :)

bavaal ने कहा…

Bahut bahut shukriya aap sabka jo lal(Sameer lal) aur bavaal (mera)kee hausla afzai kee. Koshish jari rahegi.

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut theek!
bilkul baja farmaya hai aapne!

sameer ji ki post ki wajah se ek khubsurat rachna ban gayee!
is ka poora shrey sameer ji ko jaayega!

साधवी ने कहा…

अल्पना जी सहमत होती हूँ, श्रेय तो समीर जी को ही जाता है इसका. आपकी मेहनत भी कमतर नहीं आंकी जा सकती. आपको मैं बधाई देती हूँ और समीर जी को उनकी ही भाषा में साधुवाद देती हूँ जो इस रचना के जनक कहलाये.